स्त्रियों की पूजा

स्त्रियों की पूजा
75 / 100

 

स्त्रियों की पूजा

स्त्रियों की पूजा

 

भारतीय सनातन संस्कृति में स्त्रियों की पूजा प्राचीन काल से चली आ रही है।

इसका ज्वलंत उदाहरण हमे श्री राम चरित मानस में मिलता है जब माता सीता वन में श्री राम के साथ गयी थी। महिलाओ को वर चुनने की स्वतंत्रता थी क्यो की पहले स्वयंबर की प्रथा थी। नवरात्रि में कन्याओ के पूजन का विधान था।

घर परिवार में महिलाओं को एक समान देखा जाता है। बिना पत्नी के पूजा हवन यज्ञ अनुष्ठान नही होता था। रानी लक्ष्मी बाई को भला कौन भूल सकता है इस वीरांगना ने अपनी सनातन संस्कृति की रक्षा के लिए क्या क्या नही किया ?

ऐसे ही बहुत से उदाहरण भरे पड़े है। लेकिन इन सब के बीच ऐसा कौन सा कारण हमारी संस्कृति के बीच आ गया कि महिलाओं को अबला बेचारी जैसे शब्दों से संबोधित किया जाने लगा।

इसके पीछे का कारण हमारी संस्कृति नही अपितु हमारे समाज और संस्कृति को तोड़ने वाले कुकृत्य जिम्मेदार है। कहना गलत न होगा कि हमारे पूर्वजों ने एक समय अपनी जिम्मेदारियों से मुह मोड़ लिया। क्षत्रिय , वंश परंपरा में राजा अपने को ईश्वर समझने लगा, वर्धन वंश के बाद के राजाओं ने अपनी मनमानी शुरू कर दी। सामंती व्यवस्था आ गयी। लोग स्वछंद आचरण करने लगे। इसी बीच दुर्दांत आक्रमणकारी आते रहे और भारतीय राजाओ को परास्त करते गए।

लूट अत्याचार चरम पर पहुच गया। जिसका परिणाम यह हुआ कि पृथ्वी राजचौहान के समय तक मे भारत देश टूट कर बिखर गया। रही सही कसर गजनवी और गौरी जैसे आक्रमणकारियों ने पूरी कर दी। इसी बीच मुसलमानो का साम्राज्य स्थापित हो गया, जो हमारी संस्कृति से बिल्कुल भिन्न था। यहाँ के लोगो को उन लोगो ने अपना गुलाम समझा।

महिलाओ को दासी समझा। जो महिला बाहर जाती उसके साथ दुराचार ही नही वरन अपने महल की दासी बना लिया। महिलाओ को वस्तु समझा जाने लगा। और धीरे धीरे भारतीय सभ्यता विलुप्त हो गयी।

औरतो को घर की चार दिवारी में रखने का शौक हमारी सभ्यता में नही है, लेकिन किसी की बुरी नजर हमारी बहन बेटियो पर न पड़े। इसके लिए कुछ कठोर कदम उठाना पड़ा। बाद में हमारी संस्कृति को चोट पहुचाने के लिए तरह तरह के गुलाम लेखको सहित्यकारो के द्वारा अबला, बेचारी जैसे शब्द गढे गए। जबकि सत्य तो यह है कि स्त्री कभी बेचारी अबला थी ही नही।

सच को बताने का समय आ गया है। ताकि हमारी बहन बेटियो माताओ को ये न लगे कि उनके साथ अत्याचार हुआ था। विवशता ने ऐसा कर दिया। अन्यथा आज भी जब समाज को लगता है कि अब माहौल सही हुआ है। बेटियो माताओ बहनो को आगे आने का अवसर दिया गया है, और दिया जाएगा।

बस कुछ असभ्य असामाजिक दुराचारियो के आचरण ने विवश कर दिया था। इसलिए भारतीय समाज के विद्वत जनो से हमारा ये निवेदन है कि अपने घर की माताओ बहनो बेटियो बहुओ को उसी प्रकार से सम्मान दीजिये जिस प्रकार सनातन संस्कृति में होता आया है।

मान लिया कि कुछ महिलाएं अपने को स्वतंत्र मानते हुए चलना चाहती है तो इसमें उनका दोष नही है, वरन हमारी विवशता को न समझ पाने के कारण उनके मन मे विद्वेष की भावना आन पड़ी है। इसलिए अब समय आ गया है कि महिलाओं को भी शिक्षा द्वारा सम्मान पूर्वक जीवन जीने का अधिकार देना चाहिए।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *