सफलता को आज के लोगो ने कैसे परिभाषित किया ?

सफलता
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सफलता को आज के लोगो ने कैसे परिभाषित किया ?

सफलता

सफलता : एक पिता के लिए उसका पुत्र कैसा होता है ? इस वात्सल्य प्रेम को बताने की आवश्यकता नही है।

हर पिता अपने पुत्र को सफल होते हुए देखना चाहता है, किन्तु सफलता का मापदंड क्या है ? एक पिता अपने पुत्र से कितना स्नेह करता है, इसे बताने की आवश्यकता नही है। किन्तु सफलता मिल जाये, वो अपने पुत्र को अच्छी और उच्च शिक्षा के लिए दिन रात मेहनत करता है। उसका पूरा ख्याल रखता है। वो अपने पुत्र को इतना योग्य बनाना चाहता है कि वो आगे चलकर इंजीनियर, डॉक्टर और भी अच्छे पोस्ट को प्राप्त कर ले।

दुनिया की चकाचौंध भरी दुनिया मे एक पिता सोचने लगता है कि मेरा पुत्र इतना पढ़े की अमेरिका, इंग्लैंड आदि बाहरी देशों में सेटल हो जाये। वो अपने उस पुत्र को अपने से दूर करने के लिए सोचता है जिस पुत्र को देखे बिना उसे चैन नही मिलता। अगर पुत्र को थोड़ी सी तकलीफ हो जाती है तो एक पिता उस समय संसार का सबसे दुखी प्राणी बन जाता है।

जरा सोचिए जो पिता अपने पुत्र को इतना स्नेह करता हो, जिसके लिए वो दुनिया का हर बोझ उठाने के लिए तत्पर हो। ऐसी क्या बात हो जाती है कि वो अपने ही पुत्र को अमेरिका इंग्लैड और कनाडा आदि देशों में भेजने के लालायित है।

हमने बहुत नजदीक से ऐसे माता पिता को महसूस किया है, उनके दुख को महसूस किया है, जिनके चहरे पर बनावटी खुशी और बेटे की उपलब्धि का बखान तो रहता है लेकिन जब वो रात में सोने जाता है तो अपने पुत्र के स्नेह को याद करके अंदर ही अंदर बहुत रोता है।

आज तो ये हालात है कि जो पुत्र विदेशों में सेटल नही हो पाते वो अपने माता पिता से दूर होने के लिए अपने ही देश के किसी कोने में चले जाते है।

मेरा मानना है कि एक योग्य और सफल व्यक्ति की पहचान ये नही होनी चाहिए कि वो सफल होकर दूसरे क्षेत्र ,या दूसरे देश मे अपनी सेवाएं दे। जिसका सिर्फ बाहरी दुनिया के लोग इस्तेमाल करे और इस्तेमाल करके छोड़ दे।

सफल और योग्य व्यक्ति की पहचान तब होती है जब वो पढ़ लिखकर काबिल बनकर अपने गाँव, अपने क्षेत्र और अपने देश का विकास करे।

दुनिया के लिए वो सूर्य बन जाये कोई दिक्कत नही है। लेकिन एक माता पिता के लिए वो हमेशा चंद्रमा बना रहे। दिन भर अपनी प्रतिभा से गाव क्षेत्र और देश को प्रकाशमान बनाये। और शाम होते ही शीतल छाया बनकर चंद्रमा की तरह अपने घर मे अपने माता पिता अपने बन्धुओ के साथ समय बिताये।

मेरे खयाल से प्रतिभासम्पन्न व्यक्ति की योग्यता की असली पहचान यही है।

रचना :-
पं0 शिवा कांत पांडेय

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