सनातन परंपरा के सात चिरंजीवी

सनातन परंपरा के सात चिरंजीवी
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सनातन परंपरा

सनातन परंपरा के सात चिरंजीवी

जिस प्रकार से हम मानते हैं कि हमारी संस्कृति  (परंपरा) और सभ्यता ही हमारी जननी और पहचान है।उसी सनातन संस्कृति में कई रोचक बातें भी है।उन्हीं में से एक है चिरंजीवी और अमरत्व की बात।सनातन धर्म के पुराण,रामायण,महाभारत में सात ऐसे व्यक्तित्व की चर्चा सुनने और पढ़ने में आती है जो वर्तमान में भी पृथ्वी पर विभिन्न रूपों में किन्हीं किन्हीं कारणों से विचरते हैं।
चिरंजीवी शब्द का अर्थ ही है वह जो चिर काल तक जीवित रहे।कभी यह वरदान रूप में कुछ को प्राप्त हुआ, तो कभी शाप के समान सिद्ध हुआ।देखते हैं कौन से ऐसे लोग हुए जो आज भी हमारे बीच वास करते हैं।इन सात व्यक्तियों में पहला नाम आता है रामायण से रावण के भाई विभीषण का।रावण के विरूद्ध युद्ध में इन्होंने राम का साथ दिया।राम की रावण और लंका विजय के बाद वह लंका के राजा के रूप में आसीन हुए।विभीषण को ब्रह्मा जी से वरदान प्राप्त था कि वह चिरंजीवी होंगे और सदैव धर्म के अनुकूल कार्य करने के साथ धर्म के लिए लोगों का मार्गदर्शन भी करेंगें।
इसी कड़ी में अगला नाम है महर्षि परशुराम का,जिन्हें भगवान विष्णु का छठवां अवतार भी कहा जाता है।भगवान परशुराम को समस्त अस्त्र शस्त्र और युद्व विद्या का गुरु माना जाता है। इन्हें इसकी शिक्षा स्वयं भगवान शिव ने दी थी। कल्किपुरान के अनुसार जब भी कलियुग का अंत होगा परशुराम अपने फरसे से संहारक का मार्गदर्शन करेंगे।अगर देखा जाए तो शिवपुराण में भी परशुराम की चर्चा है,वहीं रामचरितमानस में सीता स्वयंवर के दौरान राम लक्ष्मण परशुराम संवाद का प्रसंग है।द्वापर युग में उन्होंने कर्ण को शस्त्र विद्या का ज्ञान दिए।इसीलिए कहा गया है कि जब भी मानवता का संहार होगा परशुराम हर युग में प्रकट हो उसकी रक्षा करेंगे।
ऐसे ही एक चिरंजीवी हुए बालि,जो तीनों लोकों के राजा थे और महबालि कहे जाते थे।वामन अवतार में भगवान विष्णु से उन्हें चिरंजीवी होने का वरदान प्राप्त हुआ।मान्यता है कि हर वर्ष ओणम के दिन वह केरल अपनी भूमि पर अपने लोगों से मिलने आते हैं।
अगला नाम है राम भक्त हनुमान जी का।हनुमान जी को श्रीराम से वरदान प्राप्त था कि जब तक धरती पर राम की आराधना और स्तुति होगी तब तक हनुमान जी का वास होगा।भक्ति की अद्भुत मिसाल के रूप में संकटमोचन का नाम और वे चिरंजीवी हैं।
अमरत्व की इस यात्रा में अगला नाम है महर्षि वेदव्यास का।माना जाता है कि व्यास जी त्रेतायुग के अंत में आए और द्वापर के अंत में महाभारत की रचना किए।कहा जाता है कि वे कलियुग में भी व्याप्त हैं।महर्षि व्यास को यह वरदान प्राप्त था कि जब तक पृथ्वी पर मानवजाति का वास होगा, वह पृथ्वी पर विद्यमान होंगे।व्यासजी के बारे में यह भी चर्चा का विषय है कि उन्होंने वेदों को रचना में भी योगदान दिया।युगांतर के समय वह एकमात्र बचे रहे इसलिए वह अमर हैं।
कृपाचार्य,कौरवों के कुलगुरू कृपा उनके विरूद्ध युद्ध लड़े और महाभारत समाप्त होने पर बचने वालों में से एक थे।बाद में उन्होंने अर्जुन के पौत्र और अभिमन्यु के पुत्र परीक्षित को युद्ध कौशल की शिक्षा दी।जो बाद में अपने निष्पक्ष और न्यायिक निर्णय के लिए प्रख्यात राजा परीक्षित हुए।
महाभारत में अमर सबसे प्रसिद्ध नाम है अश्वत्थामा।भगवान शिव की कड़ी आराधना के बाद द्रोणाचार्य को पुत्र के रूप में प्राप्त अश्वत्थामा को रुद्र के ग्यारह अवतार में से एक माना जाता है।पिता की मृत्यु के बाद जनसंहार करने के दंड स्वरूप श्रीकृष्ण ने उसे शाप में अमरत्व दिया।कृपाचार्य और अश्वत्थामा यह ही दो नाम ऐसे हैं जो महाभारत के बाद जीवित बचे हुए हैं।

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