संदेश और सवाल

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संदेश और सवाल

बीसवीं सदी के महान संचार शास्त्री मार्शल मैकलुहान ने कभी कहा था कि ‘माध्यम ही संदेश है’ और इसके पीछे के तर्क में उन्होंने कहा था कि हम संदेश के तत्व और उसमें अंतर्निहित भाव को बाद में विश्लेषित करते हैं पहले हम उस माध्यम के बारे में सोचते हैं जिसके द्वारा वो संदेश प्राप्त हुआ है, और कई बार तो हम माध्यम की छवि के हिसाब से संदेश ग्रहण करने से पहले ही अपने मन में धारणा बना चुके हैं और संदेश का प्रभाव पहले ही तय कर लेते हैं।

उनके इस कथन के दौरान आज की तरह संचार के साधनों में इंटरनेट और मोबाइल इत्यादि नहीं थे पर उन्होंने उस दौर में ही ग्लोबल विलेज की कल्पना कर ली थी और इक्कीसवीं सदी आते आते उनका मानना पूरी तरह सच भी दिखने लगा और विश्व के कोने कोने में इंटरनेट और मोबाइल पहुंच गया, और धीरे-धीरे संचार के सबसे प्रबल साधनों में फेसबुक , ट्विटर, व्हाट्सएप जैसे सोशल नेटवर्किंग साइट्स का कब्जा हो गया।

कहते हैं ना कि जब कोई चीज आम लोगों की पहुंच में आसानी से उपलब्ध हो जाती है तो उससे गुणवत्ता की उम्मीद उतनी कम हो जाती है। इसी तरह आजकल इन सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर भी हर कोई अपने अपने हिसाब से ज्ञान बाँचता नजर आ जाता है, ज्ञान बांटना और किसी भी मुद्दे पर अपना मत रखना अच्छी बात है, पर जब ये बात तथ्यों से छेड़छाड़ और भ्रम फैलाने से जुड़ जाती है तो ये ही माध्यम घातक भी होने लगते हैं।

इस प्रकरण को मैकलुहान के कथन से जोड़कर देखा जाए तो समझ आता है कि लोग आजकल व्हाट्सएप पर आए किसी भी फ़ॉर्वर्डेड मैसेज को बिना जांचे और बिना कुछ सोचे उसपर खुशी और चिंता व्यक्त करना शुरू कर देते हैं। एक इसी तरह का मैसेज जिसमें ‘हमारे राष्ट्रगान को संयुक्त राष्ट्र से सर्वश्रेष्ठ राष्ट्रगान घोषित होने की बात’ लिखी होती थी और न जाने कितने लोग उसे सच मान कर खुश होते थे और उसे आगे भेजते थे।

आये दिन लोग सरकार पर , उसकी नीतियों पर गुस्सा होते और खुशी से नाचते फेसबुक, ट्विटर , व्हाट्सएप पर दिख जाते हैं और उसी के साथ कितना कितना झूठ उसके सहारे परोसा जाता है ये बहुत चिंताजनक है। आम लोग जो किसी दस्तावेज या सरकारी आदेश को पढ़ने की ज़हमत नहीं करना चाहता वह व्हाट्सएप पे आये मैसेज और फेसबुक और लिखी किसी बात को ही सच मान लेता है।

Guest Article By Jugal Kishor

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