सामाजिक सौहार्द को बढ़ावा देता है संत रविदास का चिंतन

संत रविदास
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सामाजिक सौहार्द को बढ़ावा देता है संत रविदास का चिंता

संत रविदास

मन चंगा तो कठौती में गंगा का संदेश देने वाले संत रविदास जी की जयंती आज 27 फरवरी माघ पूर्णिमा की अवसर पर मनाई जा रही है। संत रविदास जी ने समरसता और सौहार्द का संदेश देने के साथ कर्म को श्रेष्ठ बताया। उनका चिंतन आज के समाजिक उत्थान सर्वोपरि माना जाना चाहिए। सांसारिक आडंबर छोड़कर ह्रदय की पवित्रता पर बल देने वाले संत रविदास सरल थे। भक्त रविदास जी का जन्म विक्रम संवत 1433 में माघ पूर्णिमा के दिन काशी के शूद्र परिवार में हुआ। रविदास का हिंदी निर्गुण काव्य धारा में विशेष योगदान रहा है। गुरु ग्रंथ साहिब में उनके 41 पद दर्ज किए गए हैं। रविदास जी का चिंतन सरलता आंतरिक निश्चलता और निर्मलता पर आधारित है।वह मर्मस्पर्शी मंत्र देकर दीन दलितों के अधिकारों को दिलवाने के लिए आजीवन संघर्ष करते रहे।देखा जाए तो संत रविदास क्रांतिकारी,समाज सुधारक,दार्शनिक,भक्त और कवि की अनेक विशेषताओं से विभूषित थे। इन्हें कबीर के बाद सर्वाधिक लोकप्रिय संत माना जाता है।
संत शिरोमणि के पदों में सहजता, नम्रता और दीन भाव साफ प्रकट होता है।इसी कारण से उनके पद अनुयायियों के मन को तुरंत प्रभावित करता है।उनका काव्य उद्दात मानवता के लिए आवश्यक सदाचारों के शाश्वत और सैद्धांतिक मूल्यों का अक्षय भंडार है।इस चिंतन में हर वर्ग के व्यक्ति के लिए कुछ न कुछ दिया गया है।

समाज में धर्म के नाम पर तथाकथित क्रियाकलाप मनुष्य और मनुष्यता के दुश्मन बनकर हमारे सामने आए दिन आते हैं।रविदास जी इन आडंबरों से मुक्त हो कर मन की शुद्धता और श्रम को महत्त्व देने की शिक्षा दी।यही कारण है कि जाति,धर्म और संप्रदाय से परे होकर रविदास जी का चिंतन पूरे विश्व को प्रकाशित करता है।उनकी बातें कम शब्दों में विस्तृत अर्थ देती हैं,जिससे उन्हें सामाजिक क्रांति का अग्रदूत कहा जाता है।आज के इस आधुनिक समय में संपूर्ण मानव जाति को विखंडित होने से बचाने के लिए रविदास जी के चिंतन का अनुसरण करना आवश्यक है।

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