योग की अवधारणा

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योग

योग की अवधारणा

योग एक ऐसी साधना है जिससे सभी कुछ प्राप्त किया जा सकता है।योग मात्र प्राणायाम और आसान नहीं है बल्कि यह संस्कृति,परंपरा और यहां तक कि ईश्वर की आराधना का वैज्ञानिक साधन है।शारीरिक क्रियाओं द्वारा शरीर ही नहीं बल्कि मन और आत्मा का त्रिवेणी संगम ही योग है।भारत के सनातन परंपरा में यह ध्यान की धारणा के साथ सदैव से विद्यमान है।आदि योगी भगवान शिव जिस ध्यान की मुद्रा शांभवी को धारण करते हैं वह योग साधना का प्रारूप सृष्टि के निर्माण से भी पहले से मौजूद है।कुल मिलाकर मनुष्य की उत्पत्ति के साथ ही योग दर्शन की परंपरा हमारे सनातन धर्म में गहरा प्रभाव छोड़ती दिख रही है।जैसे जैसे सनातन परंपरा की शाखाएं जैन और बौद्ध धर्म के साथ योग साधना विश्व के विभिन्न क्षेत्रों तक पहुंचा।समय के साथ इसके दर्शन की विकास यात्रा भी हमारे सामने है।भगवद्गीता में योग शब्द का प्रयोग कई रूपों में किया गया है।वेदोत्तर काल में भक्तियोग और हठयोग भी देखा जा सकता है।वर्तमान पद्धति के अनुसार पतंजलि के योग दर्शन को सर्वाधिक सम्मान प्राप्त है। उसमें भी योग के विभिन्न आयामों पर प्रकाश डाला गया है।जैसे पाशुपत योग,महेश्वर योग,क्रियायोग, इन सभी रूपों में योग शब्द के अर्थ हैं वह एक दूसरे से भिन्न हैं।इससे यह बोध होता है कि योग को परिभाषित करना अत्याधिक कठिन है।शिव शक्ति आराधना का प्रमुख मार्ग तंत्र भी योग पर ही आधारित है।अष्टांग योग द्वारा साधक अपनी कुण्डलिनी शक्ति को जागृत कर मोक्ष का मार्ग प्रशस्त कर सकता है।यौगिक क्रियाओं का अनुसरण गृहस्थ भी कर सकते हैं बशर्ते वह अपने अंदर अनुशासनिक प्रवृत्ति, संयम तथा यौगिक नियमों को विकसित करे।योग के बल पर असाध्य रोगों को दूर किया जा सकता है।विभिन्न रोगों के निराकरण के लिए योग की अनेकों क्रियाएं हैं।बात अगर वर्तमान परिदृश्य की हो तो नई पीढ़ी का झुकाव योग की तरफ कम होता जा रहा है।जगह जगह पर योग स्कूल खोलकर प्रशिक्षण दिया जा रहा है लेकिन दुर्भाग्य यह है कि इन केंद्रों का उद्देश्य धनार्जन की तरफ संकेत करता है जिससे की योग का वह वास्तविक स्वरूप जो अध्यात्मिक था,जिसका मुख्य लक्ष्य आत्मा की शुद्धि और पवित्रता थी,स्वस्थ व्यक्ति का निर्माण,केवल तन से ही नहीं अपितु मन, कर्म और वाणी को भी स्वस्थ करना था। वह कहीं खोकर रह गया है।शायद यही कारण है योग को वैश्विक पटल पर प्रोत्साहित करने के लिए योग दिवस के रूप में मनाने की आवश्यकता पड़ गई।जिससे की वर्तमान पीढ़ी बड़ी मात्रा में इससे परिचित हो सके।

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