मोक्ष क पंथा: काशी

मोक्ष क पंथा
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मोक्ष क पंथा: काशी

 

काशी:

(मोक्ष  मोक्ष क पंथा) पुरुषार्थ शब्द में दो शब्दों का प्रत्यायन संस्कृत महर्षियों द्वारा किया गया है-(पुरुष एवम् अर्थ: इति व्युत्पत्या पुरुषस्य=ब्राह्मण:प्राप्ति: पुरुषार्थ शब्दस्यार्थ:)एक पुरुष दूसरा अर्थ । पुरुष के द्वारा कामना पूर्वक जो कार्य किया जाता है उसे पुरुषार्थ कहा जाता है। कामना किस विषयक हो उसके निर्धारण में आचार्यों ने चार सोपान निर्धारित किए जो क्रमशः धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष है। इस प्रकार चार पुरुषार्थ हुए क्रमश: एक धर्म विषयक पुरुषार्थ, दो अर्थ विषयक पुरुषार्थ, तीन काम विषयक पुरुषार्थ, चतुर्थ मोक्ष विषयक पुरुषार्थ। अंतिम सोपान की प्राप्ति हेतु प्रथम सोपान से क्रमशः आरोहण आवश्यक होता है यहां ध्यान देने योग्य यह है कि इन सबके बाद भगवत गति को भी पांचवा पुरुषार्थ माना गया है।(गोस्वामिमते “भक्ति पंचमपुरुषार्थ” इति शब्दकल्पद्रुमोलेस्वमनुसृत्य पुरुषार्था: पंच इति ज्ञायते।)
जीवन के उपर्युक्त चार पुरुषार्थों में धर्म की प्रतिष्ठा प्रथमेश की गई है। धर्म पूर्वक अर्थ और काम का सेवन करते हुए अंततः मोक्ष प्राप्त करना सुलभ होता है। इसलिए मोक्ष परम पुरुषार्थ कहा गया है। लेकिन इस परम पुरुषार्थ की प्राप्ति को अत्यंत दुर्लभ और देवी कृपा से ही प्राप्त किया जा सकता है इसीलिए आदि गुरु शंकराचार्य ने विवेक चूड़ामणि में मुमुक्षुत्व के विषय में लिखा है, यथा:
दुर्लभम त्रयमेवैतददेवानुग्रह हेतुकम।
मनुस्यत्तवाम मुमुक्षुत्वम महापुरुषवसंश्रयः।।
अर्थात तीन चीजें इस पृथ्वी पर अत्यंत दुर्लभ है पहला मनुष्य का जन्म, दूसरा मोक्ष की कामना और तीसरा महापुरुषों या गुरुजन का आश्रय यह तीनों भगवत कृपा से ही प्राप्त हो सकती है स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भागवत गीता में कहा है-मनुस्याणाम सहस्त्रेशु कश्चिद्यतति सिद्धये ।
यततामपि सिद्धानाम कश्चिन्माम वे त्ति तत्वतः।।
अर्थात हजारों मनुष्यों में से कोई एक मेरी प्राप्ति के लिए यत्न करता है और उस यत्न करने वाले योगियों में भी कोई एक मेरे पारायण होकर मुझको तत्व से अर्थात यथार्थ रूप से जानता है। इससे स्पष्ट है कि मोक्ष की प्राप्ति भगवत भक्ति (पांचवें पुरुषार्थ) द्वारा ही संभव है।
मोक्ष विषयक पुरुषार्थ : मोक्ष धातु से धञ प्रत्यय होकर मोक्ष शब्द निस्पंन्न होता है। बिना किसी आवरण के अपने आत्म प्रकाश से निरविच्छिन्न परमानंद धन की प्राप्ति ही मोक्ष है- मोक्षस्तु निरावरणस्वप्रकाशनिरविच्छिन्न परमानन्दधन: परमात्मैवतद्भिन्नर्तत्वेनबाधितत्वात जैसे सूर्य के प्रकाश से दिन और रात्रि की कल्पना होती है। उसी तरह अज्ञान के द्वारा ब्रह्म में बंध कल्पना और उसके अपवाद में मोक्षकल्पना होती है।
श्री भागवतेडपिअज्ञानसंज्ञौ भवबन्धमोक्षौ द्वौनाम नान्यौस्त ऋतुज्ञभावात ।
अजस्रचिन्त्वात्मनि केवले परे विचार्यमाणे तराणाविवाहनी।। ( श्रीo भाo-10/14/26)
मोक्षोनाम जीवस्य स्वरूपेणावस्थानम । जीव का स्व-स्वरूप में अवस्थापित होना ही मोक्ष है
मोक्ष कोई पृथक तत्व या पदार्थ नहीं अपितु स्वरूप का अवबोध होना ही मोक्ष है। मोक्ष के विषय में डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन के विचार हैं कि “आत्मा के विलोप का नाम नहीं प्रत्युत चैतन्य के विस्तार तथा प्रकाश के द्वारा अपनी अनंतता और निरपेक्षता का साक्षात्कार कर लेने का नाम मोक्ष है।”
गोस्वामी तुलसीदास जी इस विद्या को लोकेषणा की संज्ञा देते हैं और 8 सुहृद परिवार का नाम देते हैं। जननी, जनक, बंधु, सुत, दारा।/ तनु, धनु, भवन, सुहृद परिवारा ।। और कहते हैं सब के ममता ताग बटोरी अर्थात उपर्युक्त ऑठों बंधनों से इकट्ठे मुक्त होने पर ही मोक्ष की प्राप्ति संभव है। अन्यथा जीव अज्ञानतावश सांसारिक बंधनों में बधा रहता है।
भारतीय भारतीय ज्ञान परंपरा में आस्तिक एवं नास्तिक प्रत्येक शाखा में मोक्ष की स्थिति को स्वीकार किया गया है भले ही स्वरूप और प्राप्ति में भिन्नता हो जैसे चरवाक- मरण; जैन दर्शन-क्रोध,मान, माया, लोभ से मुक्ति; बौद्ध- निर्वाण; न्याय और वैशेषिक दुखों की अत्यान्तिक निवृत्ति; पतंजलि-योगदर्शन; वेदांत- ब्रह्मभाव; अद्वैत-विद्या की निवृत्ति; कबीर व तुलसीदास इन सबको प्रपंच मानते हैं अर्थात प्रपंच संबंध का विलय ही मोक्ष है “प्रपंच संबंधविलयो मोक्ष: ।”
काशी: ज्ञान प्रकाश पुंज:
काशी इन सब प्रपंचों मे रहकर भी इन से मुक्त है। काशी अपने आप में जायदा, रहेदा, होयेदा के विशेषणों में निबद्ध रहता है।
मृत्यु-बोध वास्तव में आत्मा के लोक भाव में, लोकशक्ति में आप प्रवास से पूर्ण निवर्तन की स्थिति ही सिद्धि हैं। इसी रूप में मृत्यु भयोत्पादक नहीं रहती वह आनंद की पर्याय हो जाती है। काशी इसी मृत्यु बोध को आनंद का पर्याय बना देती है। यथा: एक वार्ता कुछ इस प्रकार है-” गुरु कोरोना वायरस बड़ी तेजी से बढ़त हौ, दूसरा व्यक्ति मुंह में पान घुलाकर – बढ़ेदा सारे के” एक जोरदार ठहाका और मृत्यु बोध लोक शक्ति में आत्म प्रवास से आनंद का पर्याय बन जाती है। ऐसा नजारा आप आज केवल काशी में ही देख सकतें हैं। लोक में महाश्मशान में हास-परिहास वर्जित है लेकिन काशी में यह शगल है, यहां महाश्मशान में होली होती है तो गणिकाओं का नृत्य-संगीत भी, नगाड़े-ढोल की थाप से अंतिम यात्रा निकलती है, तो हास्य कवि सम्मेलन भी आयोजित किए जाते हैं। यह ज्ञानी गुरुओं की काशी है। जहां हर कोई गमछा और पान से अंगीभूत हो परम पद को स्वत: ही प्राप्त कर लेता है । इस परम पद की प्राप्ति में काशी का परिक्षेत्र् स्वयं ही सहायक सिद्ध होता है मत्स्यपुराण(184/8) के अनुसार श्मशानमित्ति विख्यातविमुक्तम शिवालयम/ पुरी वाराणसी ताम तु श्मशानम विमुक्तकम।।
लिंग पुराण (पृष्ठ 123) के अनुसार ” अविमुक्तं च स्वर्लानम मध्यमकम शुभम/ एतत् त्रिकंण्टकम नाम मृत्युकालेSपदम।।”
काशी खंड (57/ 91; 54/5) के अनुसार महाश्मशानभूभागम स्वर्गद्वारा समीपत:
त्रिकंटक, अवमुक्त या महाशमशान काशी अपने व्यवहार में भी मोक्षदायिनी है। उसे सितम तो मुझे सब्र आजमाना था यह स्थिति जिंदगी में आकर जिंदा रहने की पीड़ा को आनंद में बदल देती है। काशी में लोग त्रयोदशा यानी मृत्यु भोज में भी खाते नहीं सोखतें हैं और यहां सब्जी खिलायी नही जाती गिराई जाती है। अरे गुरु काजू क बढ़िया सब्जी गिरउलस और उस पर से नसीहत देखिए ऐ बेटा देख ला बाऊ में कोई कमी न होए के चाही अर्थात बाबा की तेरहवीं की पूडी छक रहे हैं और पिता की तेरहवीं की पूड़ी का इंतजाम भी कर रहे हैं, जबकि अपनी जान का कोई ठिकाना नहीं है।
और पिता भी वही खड़े-खड़े हैं यह सब सुनकर हंस रहे हैं। जबकि उन्ही के मौत की बात हो रही है। यक्ष का युधिष्ठिर से दूसरा प्रश्न यही था कि किमआश्चर्यम् जिसका धर्मराज उत्तर देते हैं कि-
अहन्यहनि भूतानि गच्छन्ति यममंदिरम / रोषा: स्थिरत्वनिच्छन्ति किमआश्चर्यम्तः इस विष्मय का निदान महाश्मशान जाकर ही होता है वहीं अनिकेत शिव का वास है। शिव सबको तारक मंत्र देते हैं। इसे श्मशान ज्ञान कहा जाता है। जो मोक्षदायक है और काशी में कण – कण शंकर घर-घर मंदिर है ऐसे में पूरा क्षेत्र ही महाश्मशान है और हर क्षण हर घटना में श्मशान ज्ञान अर्थात मोक्ष की प्राप्ति होती रहती है । एक आख्यान और, और शब्दों को मोक्ष की प्राप्ति।
मदनपुरा में दो विदेशी युवतियां काशी भ्रमण कर रही थी उनमें से एक मानचित्र लेकर जगह – जगह का मिलान कर रही थी और दूसरी कमर में स्वेटर बांधे स्वच्छंद विचरण कर रही थी। इतने में जो उन्मुक्त भाव से काशी देख रही थी वह रास्ते में पड़ने वाले गोबर को लांघ जाती है और दूसरी जो उसके पीछे मानचित्र में काशी ढूंढ रही थी उसका एक पैर गोबर में पड़ जाता है। एक खूब हसती है और दूसरी अपनी अवस्था पर खूब खींझती है द्रष्टा बन मैं भी हंस रहा था तात्पर्य यह है कि काशी को पुस्तकों, मानचित्र और इतिहास में ढूंढगें तो नसीब में गोबर और इसे जीने की कोशिश करेंगे तो मोक्ष अर्थात आनंद की प्राप्ति होगी आनंद अर्थात मोक्ष की प्राप्ति सब सुख लहै तुम्हारी सरना

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