मोक्ष की धारणा से विकसित संस्कृति:काशी

मोक्ष की धारणा
82 / 100

मोक्ष

मोक्ष की धारणा से विकसित संस्कृति:काशी

मोक्ष काशी का एक अन्य नाम महाश्मशान है।काशी खण्ड के अनुसार ‘श्म’ का शव और ‘शान’का शयन अर्थ है।काशी की वास्तविकता के अनुसार यह ठीक भी है।प्राचीनकाल में इसका अधिकांश खण्ड शव दाह के प्रयोग में था।अनेक स्थलों पर चौरा और सती स्थल का होना यह स्पष्ट भी करता है।वैसे काशी तो प्रलय रहित है।शिव और शिवा का जहां निरंतर वास हो,कहा जाता है कि प्रलय काल में भी वे इस स्थान को नहीं छोड़ते जिससे यह अविमुक्त है।इस धारणा का विकसित स्वरूप यहां की संस्कृति में साफ परिलक्षित होता है।
शिव के त्रिशूल पर बसी काशी में अगर मोक्ष की प्राप्ति नहीं होगी तो कहां होगी?त्रिशूल का अर्थ है,जो जन्म,मृत्यु और पुनर्जन्म के कारक चक्र का संहारक हो।त्रिशूल, इड़ा पिंगला और सुषुम्ना नाड़ी का परिचायक है।यह तीनों नाड़ियां मूलाधार लिंग को लपेटे हुए है।भला इस ब्रह्माण्ड में भगवान विश्वनाथ के अलावा दूसरा कौन है जिसकी कुण्डलिनी वश में हो।इसीलिए त्रिशूल उनके हाथों में सुशोभित है।त्रिशूल पर बसी काशी से ही समस्त विश्व को ज्ञान रूपी प्रकाश मिलता है।यह त्रिशूल मनुष्य की कफ, वात, पित्त इन तीनों व्याधियों का संहार करता है और काशी इन तीनों से ऊपर है। अर्थात् काशी में निश्चित मोक्ष निहित है।इसीलिए महाश्मशान से अच्छा स्वरूप काशी का और हो ही क्या सकता है?सभी चक्रों से मुक्त होकर मानव परमज्ञानमय तत्व को प्राप्त करता है यही शिव की प्राप्ति करनी होती है।यह यहां की संस्कृति और संस्कारों में साफ देखा जा सकता है।
जब चर्चा काशी की संस्कृति की हो तो यहां के खानपान से परहेज़ कैसे हो सकता है!निषादों की सभ्यता से आया पान,काशी की पहचान बना है।पान वास्तव में काम,अर्थ,धर्म का साधन है क्योंकि जिस प्रकार से निषादों ने इसे आनंद में दबाया,आर्यों ने इसे देवों पर चढ़ाया।इसी आनंद द्वारा यह काशीवासियों को मोक्ष के द्वार पर खड़ा करता है,यही काशी के पान का गूढ़ रहस्य है।
काशी की संस्कृति पवित्र एवं उदात्त है।इसमें समन्वय की असीम क्षमता है।सनातन तीर्थ स्थल के रूप में देखी जाने वाली काशी की संस्कृति ही मोक्ष की धारणा से निर्मित और विकसित है। काशीवास के लिए आए मुमुक्षुओं के निवास हेतु अनेक धर्मशाला और आवास बनाए गए,उनके सुविधानुसार उनके भोजन भजन की व्यवस्था हुई।इसी ने समावेशी संस्कृति को जन्म दिया।काशी की गलियां में रहने वाले तीर्थयात्री घरों के बाहर खाना बनाना प्रारंभ किए,गरीबों में धर्म और दान की भावना से भंडारे का आयोजन शुरू हुआ।सुबह घाट पर गंगा स्नान,पूजन पश्चात् काशीवासी भरपूर नाश्ते के लिए गलियों में कचौड़ी- जलेबी का सहारा लेने लगे।दोपहर में लस्सी और ठंडाई का चलन शुरू हुआ।आने जाने वाले लोगों के लिए भी इन रसोइयों से खाना मिलना शुरू हुआ।मणिकर्णिका घाट के पास ठठेरी बाज़ार,खोवा मंडी और विश्वनाथ गली में घरों के चबूतरे पर खाने पीने के तमाम खोमचे और मिठाई ‌की दुकाने इस बात को सिद्ध करते हैं कि व्यक्ति ‌जब मृत्यु की इच्छा लिए काशी आता है,तो यहां बसने की इच्छा तो है नहीं इसलिए वह छोटी छोटी व्यवस्थाओं से अपना काम चलाना चाहता है।बनारस की फक्कड़ता में,महाश्मशान का स्वरूप साफ झलक जाता है।यहां का खानपान से लेकर काशीवासियों के रहन सहन और वेशभूषा भी सात्विकता को प्रदर्शित करती है।महाश्मशान में मुमुक्षु माथे पर भस्म चंदन लगाए,अपने ही धुन में मग्न,महादेव का जप करते चला जाता है।जिसे देखकर ही असीम आनन्दरूपी मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है।यही कारण है कि यह महाश्मशान अनंत काल से हर समुदाय और परंपरा के लोगों का निवास स्थान बना हुआ है।काशी की भूमि में अनेकानेक मठ और धर्मस्थल इस तथ्य की पुष्टि ही तो कर रहे हैं।
काशी की संस्कृति वट वृक्ष की छाया देता है,आश्रय देता है,फल देता है,रस देता है, जो ब्रह्मानंद और परमानंद से सराबोर है।इसमें समूचे विश्व की सुंदरता है,पर वह फंसाव नहीं।यह मुक्त करने वाली है,बांधने वाली नहीं।महाश्मशान आमंत्रण देता है कि इसे स्वीकार करो पर बंधो मत,क्योंकि बंधन, मोह,आसक्ति दुख का सेतु है।इसलिए काशी के समूचे काव्यार्थ को ग्रहण करो,पर किसी अंश के आसक्त मत रहो।यही सदा धाराप्रवाह रहने वाली तरंगिणी गंगा का अविरल प्रवाह हर क्षण घोषणा करता है।शिव के डमरू की गूंज से जहां वाग और अर्थमयी सृष्टि का सर्जन और सृजन होता है वहीं त्रिशूल से संहार का ज्ञान भी प्राप्त होता है।आसक्ति के नाश के लिए यह ज्ञान महत्त्वपूर्ण हो जाता है जिससे मोक्ष का मार्ग सिद्ध हो पाता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *