मानव समाज ने सनातन धर्म क्यों छोड़ा?

सनातन धर्म
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सनातन धर्म

सनातन धर्म

सनातन धर्म: समय परिवर्तन के साथ मानव ने अपनी सुविधाओ के लिए प्रत्येक वस्तुओ को अपने अनुसार ढालना शुरू कर दिया।

उसने सुविधानुसार कई वस्तुओ की रचना की। समय के साथ चलते हुए मानव ने धर्म मे भी सुविधा ढूढ़नी शुरू कर दी। धीरे धीरे कर्म की जगह अकर्मण्यता ने अपनी जगह पसारनी शुरू कर दी। हमारे मनीषियों ने जो व्यवस्था बनाई थी, वो लोगो को बहुत कठिन लगने लगी। और धीरे धीरे जिन लोगो को बहुत असुविधा होने लगी, उन लोगो ने अपनी सुविधा अनुसार अपने अपने तरीके से अपने अपने धर्म बनाने शुरू कर दिए। एक बात तो तय है कि मानव इस पृथ्वी पर समस्त जीवों में श्रेष्ठ है क्यों कि चिंतन करने का , और सोचने का अधिकार ईश्वर ने मानव को दिया।

प्रारम्भ में मनीषियों द्वारा बनाये गए सिद्धांतो का पालन लगभग अधिक से अधिक लोगो द्वारा किया गया। किन्तु आलसी प्रवृत्ति और अविवेकी लोगो ने अपने अनुसार अलग अलग तरीके से अलग अलग धर्म का निर्माण कर दिया। सनातन धर्म जिसकी महत्ता तो श्रेष्ठ थी, किन्तु उसकी जगह अकर्मण्यता ने ले ली। ताकतवर लोगो ने अपनी प्रभुसत्ता स्थापित करनी शुरू कर दी। प्रातः काल उठना, ब्रह्मचर्य का पालन करना, योग, ध्यान, करना शास्त्र और विज्ञान का अध्ययन करना। कर्म के अनुसार वर्ण व्यवस्था का पालन। इन सब से वो मानव कुंठित हो गए। जो कमजोर थे। अपनी झल्लाहट को अपनी बेबसी को दूर करने के लिए उन लोगो ने सनातनी परंपरा को मानने वाले लोगो से किनारा शुरू कर दिया, और अपनी अलग सत्ता स्थापित करनी शुरू कर दी।

प्रारम्भ में जैन, बौद्ध जिसे हम सब धर्म कहते है, उन लोगो ने सनातन धर्म को बिना जाने वाह्य आडंबर बताना शुरू किया। और उन लोगो को अपने साथ लेना शुरू किया, जो सनातन धर्म की शिक्षा दीक्षा, एवम व्यवस्था का पालन करने में अकर्मण्य थे। किसी भी धर्म को आप गहराई से अध्ययन करिये, किसी भी धर्म के प्रणेता ने वेदों का अध्ययन नही किया। उन लोगो ने थोड़ा बहोत जाना, वो भी दूर से, देखकर। और अपनी लेखनी शुरू कर दी। कोई ऐसा धर्म बता दीजिये, जिसमें आपको देखकर ये संतुष्टि मिले की उन लोगो ने वेदों का अध्ययन किया हो, शास्त्र पढ़ा हो। केवल अपने स्वार्थ और अपने को महिमा मंडन करने के लिए उन लोगो ने नए नए धर्म की स्थापना करनी शुरू कर दी।

किसी भी धर्म मे हमे ये नही दिखता की जीवन के उद्देश्य को बताया गया हो। सनातनी परंपरा में जीव से लेकर पशु पक्षी तक पेड़ पौधों से लेकर पत्थरो तक को सम्मान दिया गया। क्यों? क्यों कि ये प्रकृति के सहयोगी है। हम उन सबको साथ लेकर प्रकृति का संतुलन बना सकते है। इसीलिए पेड़ पौधों यहाँ तक कि जो निकृष्टतम जीव है, उसे भी सम्मान दिया गया। हमने साकार होकर निराकार के अस्तित्व को माना। धीरे धीरे जब मानसिक संवेदना, धैर्य, संयम मानव में कम होती गयी तो हमारे मनीषियों ने सूक्ष्मतम ज्ञान का प्रसार किया।

वेदों का अध्ययन न कर पाए तो कोई चिंता नही, पुराणों का करिये, बो भी न हो सके तो उपनिषदों से ज्ञान अर्जन करिये, वो भी न हो सके तो भागवत, और राम चरित मानस का अध्ययन करिये। किन्तु हम मानवो ने अपनी जिज्ञासा को शांत कर लिया। कुछ जानने की इच्छा का न होना, धीरे धीरे सनातन धर्म का नष्ट होने के रूप में परिवर्तित हो गया। ज्ञान नही है फिर भी लोग धर्म के बारे में बोलना शुरू कर दिए। संस्करा विहीन प्राणी, जिसे 2 घंटे बिठा दिया जाए तो 10 बार पीठ अकड़ जाएगी। वो धर्म के बारे में ऊल जुलूल बाते करता है। ऐसा लगता है जैसे वो सब कुछ जान हो गया हो। आज के हालात तो ये है कि अध जल गगरी छलकत जाए, आधा जल भी ज्ञान का घड़े रूपी मष्तिष्क में नही है। और बहस करना शुरू कर देते है, मानवता का पाठ पढ़ाने लगते है। जो तर्क विहीन अज्ञानी मूढ़ है, एक भी तर्क सामने ला दे कि सनातन धर्म मे बुराई है। हम उसी दिन से उसके गुलाम हो जायेगे।

हम उसका दास हो जायेगे। जो फिल्मो के माध्यम से दिखाया गया, उसे मान लिया। जो लोगो ने बताया उसे स्वीकार कर लिया। ये जानने की कोशिश नही की कि उस तथ्य में कितनी सच्चाई है ? सनातन धर्म का ढोंग रचने वाले गलत तरीके से प्रचार करने लगे। हम अज्ञानी, मूढ़, अपने को बुद्धिमान समझ बैठे। और अपने अहंकार में आकर हम मानव जाति पर अत्यचार करने लगे। वेदों का अध्ययन नही कर सकते न करिये, पुराण न पढ़ सके न पढ़िए। मानस का तो अध्ययन करिये। अभी भी कुछ नही बिगड़ा है। अगर अब न सुधरे तो अधर्मियों का शिकार हो जायेगे। मूढ़ अज्ञानियों का शासन हो जाएगा।

प्रकृति विह्वल हो जाएगी। विप्र धेनु सुर संत हित, लीन्ह मनुज अवतार।ईश्वर भी पृथ्वी को बचाने नही आएंगे, क्यों कि विप्र रह ही नही जायेगे। तो ईश्वर मानव रूप में अवतार किसके लिए लेगे। अपनी अस्मिता को पहचानिए। उठिए, जागिये, स्वविवेक का प्रयोग करिये। और कम से कम उन विचारों को अपनाइये। जय जय श्री सीताराम
रचनाकार
पं0 शिवा कांत पांडेय
आदर्श शिक्षा सेवा समिति

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