महाश्मशान में मोक्ष का ज्ञान : तंत्र

मोक्ष
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महाश्मशान में मोक्ष का ज्ञान:तंत्र

(मोक्ष) एकोहम् बहुस्यां प्रजायेय’की धारणा के साथ ब्रह्मा

‘एकोहम् बहुस्यां प्रजायेय’की धारणा के साथ ब्रह्मा, माया,पुरुष,प्रकृति,शिव,काली और अनेक (मोक्ष) नायक सामने आए।जिससे एक बिंदु अनेक स्वरूपों में आया।यह विषय आमजन मानस के लिए ज्ञान का विषय नहीं बन पाया।जिसे साधकों ने कई प्रकार के साधनों और साधनाओं से पाया और निरंतर पाने के प्रयास में लगे रहते हैं।यही तंत्रयोग का विषय है।इसी प्रकार से ‘सर्वविद्या की राजधानी’ के रूप में सदैव से विद्यमान यह काशी,जो हमेशा प्रकाश देने वाली है,इस ज्ञान से कैसे अंधकार में होती। तंत्रागम के प्रणेता भगवान् आदिनाथ श्री विश्वनाथ शंकर ही हैं। भगवान् ने अपने चार मुखों से पूर्व,दक्षिण,पश्चिम,उत्तर और पंच मुख से काशी जो त्रिशूल पर स्थित है, वहीं इस परम स्वरूप की स्थिति रखी।जिससे यह क्षेत्र ‘अविमुक्त वाराणसी’हुआ।
वाराणसी नगरी भूतभावन भगवान शंकर की प्रिय आवास भूमि है।केवल भारत में ही नहीं बल्कि समस्त संसार में भगवान के लिंग विग्रह व्याप्त हैं।अतः भगवान विश्वनाथ हैं और यह सृष्टि शिवमयी है। आगम शास्त्र में प्रत्येक पदार्थ तीन अवस्थाओं में रहता है,प्रथम स्थूल भौतिक रूप।दूसरा मंत्रात्मक या सूक्ष्म रूप और तीसरा है वासनात्मक रूप।तीसरे रूप का अर्थ एक आधारभूत सत्ता से है,जिसके ऊपर सूक्ष्म और स्थूल रूपों की स्थिति संभव है।समस्त संसार में यह वाराणसी अर्थात् महाश्मशान ही त्रिकोण शक्ति का भाग है।भगवती,पराशक्ति का ही स्वरूप गंगा जिन्हें ‘रसमयी त्रिपुरा’कहा जाता है,यहां साक्षात् उत्तरवाहिनी के रूप में विद्यमान है।उत्तरवाहिनी का अर्थ है सृष्टि संहार का क्रम यहां समाप्त हो रहा है। यानि मूल कारण में कार्य का विलय हो रहा है।इस अर्थ को और गहराई से देखें तो बहिर्मुखी प्रवृतियां जहां पर सदैव लीन होकर परमतत्व में समाविष्ट हो वही श्मशान है। यहीं सभी वासनाओं और अज्ञानता का दाह होता है।यहां भगवान स्वयं प्राणियों को माया बीज को ही तारक मंत्र के रूप में सुनाकर परमगती देते हैं।काशी रहस्य में स्वयं भगवान कहते हैं कि यह काशी पराशक्ति है,यह अपनी महिमा स्वयं प्रकट करती है और शरण में आने वाले का उद्धार करती है।इस प्रकार काशी स्वतंत्र सत्ता के रूप में विद्यमान है।परमब्रह्म की शक्ति के रूप में मानी जाती है।यही आगम शास्त्र आदि में वर्णित है।
ऊर्ध्वगति देने वाली समस्त नगरियों में काशी परम मुक्तिदायिनी एक तांत्रिक परिवेश में दिखाई देगी।आदिकाल से ही यह भूमि तांत्रिकों की पूर्ण राजधानी के रूप में देखी जाती है।परम अघोर संप्रदाय के मूर्तिमान स्वरूप श्रीभगवान अवधूत रामजी महाराज हैं,जो बाबा कीनाराम की प्रत्यक्षानुभूतियों में ‘क्रीमकुंड’ शब्द जो कि ‘कीं’यह बीजमंत्र है दक्षिण काली का। शवारूढा, मुंडमालिनी अघोर शक्ति की उपासना स्थली यह कुंड था। वाममार्गी उपासकों की यह उपासना भूमि है।इसी प्रकार से महाश्मशाने,त्रिकण्टकविराजते,गौरीमुखे,शब्दों का प्रयोग संकल्प में करते हैं। त्रिकण्टक का अर्थ है त्रित्व त्रिकोणात्मिका प्रकृति की इच्छा शक्ति,क्रिया शक्ति,ज्ञान शक्ति। त्रयात्मिका महाकाली जहां तीन शूलों अर्थात् अधिभौटिक,आधिक्षैविक एवं आध्यात्मिक त्रिविध शूलों से मुक्त होकर एक शून्य भूमि है।शून्य से तात्पर्य है कि जहां पर, अपर और परापर तीनों से मुक्त हो।यही महाश्मशान की वास्तविक व्याख्या है। गौरीमुख अर्थात् जहां अध: सहस्त्रार है,शिव शक्ति भावात्मक,अभावात्मक रूप से एक दूसरे से जुड़े हैं।जैसे गंगा यमुना, इडा पिंगला दोनों एक होकर विराजते हैं।यह दो नदियों वरुणा और असि के बीच का संगम स्थल है।अन्य मोक्षदायिनी पुरियों में सर्वाधिक श्रेष्ठ है।
काशी त्रिकण्टक पर वास ही इसकी तांत्रिक गतिविधि को उल्लेखित करती है।तभी तो यह अनेकों साधकों की तपस्थली बनी। श्री महाविद्या के परमोपासक श्री कुम्भज ऋषि महातंत्राचार्य विंध्याचल को शांत करके काशी से बाहर दक्षिण समुद्र चले गए।गंधिबाबा ने यहीं साधना की।ब्रम्हा पंचतंमात्र आदि वस्तुओं से सृष्टि का निर्माण करते हैं लेकिन योगी अपनी सत्ता से इच्छा मात्र से सब उत्पन्न कर देता है।अवधूत श्री भीम बाबा जो सिटी पोस्ट ऑफिस के पास नंग धड़ंग रूप में रहते थे।साक्षात् परमहंस योगी,परम तांत्रिक जड़ भरत के सदृश थे।वह भी यही निवास किये।श्यामाचरण लाहिड़ी, श्री परमश्रद्धेय आनंदमई मां भदैनी में रहती थी।जैन और बौद्ध तंत्र की भी जन्मभूमि काशी है।कहा जाता है कि शिव शक्ति ,वैष्णव,जैन,बौद्ध,गाणपत्य,दत्तात्रेय अवधूत,अघोर वामदेवादि समस्त तांत्रिक विधियों के अभिज्ञ विद्वान अभी भी अपने घरों में अपनी परंपरानुसार सभी तंत्रों की रक्षा करते हैं।जो जितना इसे ढूंढ़ पाता है उतना प्राप्त कर लेता है।कहावत भी है ‘काशी ढूंढे,प्रयाग मूढ़े,गया पिंडे’।अर्थात् न केवल तंत्र शास्त्र,योग शास्त्र अपितु सर्वविध भारतीय संस्कृत वांग्मय में वर्णित निगमागमपुराण प्रतिपादित शास्त्रों का स्वरूप काशी में यत्र तत्र सर्वत्र बीज रूप में स्थित है।प्रयत्न करना चाहिए,ढूंढ़ना चाहिए अवश्य मिलेगा।

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