मकर संक्रांति पर्व के लिए कई मान्यताये

मकर संक्रांति
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मकर संक्रांति

मकर संक्रांति

जिस तिथि में सूर्य उत्तरायण हो जाते है उस समय को संक्रांति काल कहते है। मकर संक्रांति पर्व के लिए कई मान्यताये हमारे धर्म ग्रंथो में है। ऐसा कहा जाता है कि जब सूर्य शनि से मिलने उनके घर गए तो उस काल को संक्रांति काल कहा गया। एक मान्यता के अनुसार भीष्म पितामह सर शैय्या पर लेटे रहे और सूर्य उत्तरायण होने की प्रतीक्षा करने लगे। कहा जाता है कि जब सूर्य उत्तरायण हो उस समय यदि किसी की मृत्यु होती है तो उसे देवलोक में स्थान प्राप्त होता है। एक मान्यता के अनुसार इसी संक्रांति काल मे माँ गंगा प्रवाहित होते हुए इसी काल मे सागर में जा मिली, इसीलिए गंगा सागर पर्व का उत्सव इसी मकर संक्रांति में मनाया जाता है।

वैज्ञानिक कारण

वैज्ञानिक मत के अनुसार यदि संक्रांति काल मे उरद का सेवन किया जाए तो यह पाचन क्रिया के लिए सर्वोत्तम होता है इसीलिए पुरातन काल से इस पर्व को खिचड़ी पर्व भी कहा जाता है।
दूसरा वैज्ञानिक कारण यह है कि इस दिन नदियों में वाष्पन क्रिया होती है, और कि विभिन्न प्रकार के रोगो का उपचार होता है। इसीलिए संक्रांति काल मे नदियों में स्नान करना श्रेष्ठ माना गया है।

मकर संक्रांति के समय उत्तर भारत मे ठंड का समय होता है। और वैज्ञानिक मत के अनुसार ठंड के समय गुड़ और तिल का सेवन करने से शरीर को ऊर्जा मिलती है।
अतः संक्षेप में देखा जाए तो मकर संक्रांति पर्व न केवल धार्मिक दृष्टिकोण से बल्कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी उत्तम माना गया है।

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