भारत में पत्रकारिता: आज की कहानी

भारत में पत्रकारिता
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भारत में पत्रकारिता: आज की कहानी

भारत में पत्रकारिता का अर्थ है क्रांति।भारत में पत्रकारिता की शुरुआत ही क्रांतिकारी विचारों के प्रसार हेतु किया गया।भारतीय इतिहास के पन्ने क्रांतिकारी विचारों और उनके कलमो से भरी पड़ी है।फिर चाहे वो अंग्रेज़ के रूप में हो या भारतीय के रूप में। जिसने भी पत्रकारिता का दामन थामा उसका एक ही उद्देश्य रहा,समाज सुधार और अत्याचार के विरुद्ध आवाज उठाना।यह बात सुनने में अजीब जरूर लगती होगी कि अंग्रेज़ भी क्रांतिकारी विचारों के प्रेरक बने!जी हां,भारत में पत्रकारिता की शुरुआत जेम्स ऑगस्टस हिक्की ने 29 जनवरी 1780 को कोलकाता से बंगाल गजट निकाल कर की।
अंग्रेज़ अधिकारी और शासन किसी भी प्रकार के जन जागृति और पत्रकारिता के खिलाफ थे।नतीजा यह हुआ कि उन्होंने हिक्की का दमन कर दिया।उनके प्रेस की संपत्ति जब्त कर ली गई और उन्हें जेल में डाल दिया गया।1780 के दशक में उन्हें पांच हज़ार रुपए का जुर्माना भरना पड़ा।बावजूद इसके हिक्की को जेल में मार पीट और तमाम यातनाएं सहन करनी पड़ी।फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी और जेल से ही अख़बार का संपादन किया।अंत में परेशान आकर उन्होंने बंगाल छोड़ दिया।
इसी तरह के एक अंग्रेजी संपादक हुए विलियम।उन्होंने भी हिक्की के नक्शे कदम पर चलने की कोशिश की।1785 में बंगाल जर्नल निकाला।लेकिन परेशान होकर वह भी अपनी संपत्ति छोड़ भारत से चले गए। इन दोनों का मकसद अंग्रेजी सत्ता से मुक्ति पाना था।वहीं इसके बाद की पत्रकारिता में समाज सुधार की झलक देखने को मिलती है।इसमें सबसे पहला नाम संवाद कौमुदी आता है।यह पत्र भारतीय समाज में व्याप्त कुरीतियों और रूढ़िवादिता को सामने लाने का काम करते थे।नतीजा यह हुआ कि समाज का एक वर्ग इसका विरोधी हो गया।
देखा जाए तो हिंदी भाषा का विकास भी इन्हीं पत्र और पत्रकारिता में छिपा हुआ है।बंगाल में हिक्की, विलियम और चार्ल्स ने निर्भीक पत्रकारिता की नीव रखी।यह अखबार भले अंग्रेजी में छपते हो लेकिन अंग्रेजी शासन को हिलाने का काम करते रहे।इसके बाद अब जरूरत थी अपनी भाषा की,जो आम आदमी को जोड़ सके।यह भाषा बनी हिंदी,जिसने पत्रकारिता के मायने ही बदल दिए।जिसमें आगे भारतेंदु हरिश्चंद्र,महावीर प्रसाद द्विवेदी, बाल गंगाधर तिलक,मदन मोहन मालवीय, महात्मा गांधी और विष्णु पराड़कर ने आगे बढ़ाया।आज जब इस क्रांतिकारी पत्रकारिता का अंत होते दिखता है तो मन में एक टीस सी उठती है।आज जब पत्रकारिता के ऊपर चाटुकारिता का कालिख पोती जाती है तो हर एक की आत्मा रोने लगती है।तब प्रश्न पूछे जाते हैं कि अकबर इलाहाबादी के वो शब्द कहां गए जो कहते थे कि अगर तोप सामने हो तो अख़बार निकालो।

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