भारतीय त्योहारों का पतन

त्योहारों
79 / 100

भारतीय त्योहारों

 

त्योहारों

त्योहारों आज से 20 वर्ष पहले तक हमारे आस पास उल्लास और हर्ष के साथ त्योहारो को मनाया जाता था। घर मे आनंद का माहौल होता था। लोग प्रसन्न चित्त से एक दूसरे के घर जाते थे, हंसी, ठहाके लगाते थे।जो त्योहार आता था,एक हफ्ते पहले से ही दादा दादी, बगल के पड़ोस में रहने बूढ़े ताऊ जी एक साथ सांझ के समय बैठकर चर्चा करते थे। और बताते थे कि क्यो ये त्योहार मनाया जाता है ? बच्चे भी अगल बगल खड़े होकर बड़े ध्यान से दादा और ताऊ जी की बाते सुनते थे।

बड़े बुजुर्ग बच्चो को बताते थे कि जो भी त्योहार पर्व आते है, उसके पीछे क्या धार्मिक कारण रहा है ?

लेकिन समय का चक्र ऐसा चला कि हमारे नव युवा जवान साथियो को ये सब बकवास, अंध विश्वास और पैसे का वेस्ट करना समझ में आने लगा। होली के त्योहार में पानी की बर्बादी, दीवाली पर आतिशबाजी से पर्यावरण का नुकसान होने लगा। कृष्ण जन्माष्टमी में 12 बजे रात जागकर कृष्ण भगवान का जन्म दिवस मनाना बेवकूफी लगने लगा। गुड़िया त्योहार पर गाव में झूला लगने की प्रथा समाप्त हो गयी, गाव के जवान कबड्डी प्रतियोगिता करते थे, वो सब व्यर्थ लगने लगा।

तथाकथित आज के युवा बुद्धिजीवी मित्रो को भारतीय त्योहार व्यर्थ और समय की बर्बादी वाला लगने लगा। आज जिनकी उम्र 35 से 45 वर्ष की है। उनके बच्चो को भारतीय त्योहारो के बारे में कुछ नही पता है। अगर स्कूलों में छुट्टियां न हो तो तथाकथित युवा बुद्धिजीवी साथियो को त्योहारो, एवम पर्व के बारे में कुछ भी पता न चले। यहाँ मेरे इस कथन पर कुछ मित्र अपना विरोध प्रकट कर सकते है। वो ये कह सकते है कि आप ऐसे कैसे कह सकते है? हमे तो पता है हर त्योहार के बारे में।

किन्तु इसके बाद ही हम प्रमाण के साथ कह सकते है कि अधिकतर लोग भूले रहते है। इसका एक उदाहरण समझिये।

भारतीय संस्कृति एवं सभ्यता में तिथि का बहोत ही महत्वपूर्ण स्थान है। आज भी जिस घर मे दादी, ताई ताऊ, दादा जी है उन्हें पता है कि आज एकादसी है या प्रदोष है, या कौन सा पक्ष है ? शुक्ल पक्ष है या कृष्ण पक्ष। दिशाओ का ज्ञान था, कौन सा वार है, उसका ज्ञान था। किंतु बहोत ही चतुराई से हमारी सभ्यता और पहचान को मिटाने का कुचक्र रचा गया । और सबसे आश्चर्य की बात ये की भारतीय सभ्यता को मिटाने के लिए किसी बाहरी को नही सेलेक्ट किया गया है।इसके लिए हमारे ही भाइयो, मित्रो, को मोहरा बनाया गया है।

शुरुआत का आधार शिक्षा है। भारतीय शिक्षा पद्यति को इतना कुचला गया कि आज की युवा पीढ़ी भारतीय शिक्षा पद्यति को रौदते हुए कुचलते हुए आगे बढ़ती गयी, और हम और हमारी पीढ़िया मूक बन कर देखती रही। बेबस ,लाचार ,वृद्धावस्था जैसी स्थिति बन गयी है, हमारी भारतीय संस्कृति की।

कहा जाता है कि व्यक्ति की पहचान उसके संस्कारो से होती है, और संस्कार उस देश की संस्कृति से मिलती है। जब संस्कृति का ह्रास हो जाएगा तो उस देश की पहचान मिट जाएगी। भला हो गाव देहात में रहने वाले उन पुण्यात्माओं का , जिन्होंने आज भी काफी हद तक लड़ते झगड़ते, दुत्कार सहते हुए भी अपनी संस्कृति की विरासत को सम्हाल के रखे हुए है, वरना शहरों के चकाचौध भरी दुनिया ने भारतीय सभ्यता को कुचलने में कोई कसर नही छोड़ा।

भारतीय सभ्यता गावो में बसी है, इसमे कोई संदेह नही है, किन्तु आज के समय मे बड़ी तेजी से फूहड़ता, विलासिता, अश्लीलता, गावो में भी अपना पैर पसार रही है। यदि समय रहते भारतीय आत्माओ ने अपने कदम सही रास्ते पर नही लाये, तो वो दिन दूर नही , जब त्योहारो, पर्वो उत्सवों के लिए कोई बताने वाला भी नही बचेगा। इसके रूप में ढांचा तो रहेगा लेकिन भारत की आत्मा कही घोर अंधकार में डूबा रहेगा, जहा सिसकिया लेता हुआ दम तोड़ देगा।

इसलिए आज ये जरूरत आन पड़ी है कि भारत के लोग भारत की सभ्यता एवं संस्कृति की रक्षा के लिए उत्सवों, त्योहारो, एवम पर्वो पर हर्सोल्लास के साथ एक दूसरे के लिए समय निकाले एवम अपने आने वाली पीढ़ियों को भी भारतीय त्योहारो, एवम उत्सवों के बारे बताये। जिससे हमारी आने वाली पीढ़िया पूर्वजो की दी हुई विरासत को सम्हाल सके। और उस परंपरा का निर्वहन कर सके, जिससे मानवीय सभ्यता का विकास हो सके।

रचना :-
शिवा कांत पांडेय
आदर्श शिक्षा सेवा समिति

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *