प्रकृति का प्रकोप

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प्रकृति

प्रकृति का प्रकोप

प्रकृति हमारी जननी है।इसी में मनुष्य के निर्माण के लिए आधारभूत पंचतत्व मौजूद हैं।अगर वहीं जीवनदाई पंचतत्व विकराल रूप धारण कर ले तो विनाश का कारण बन जाती है।पृथ्वी,जल,अग्नि,आकाश,वायु जहां जीवों के लिए आवश्यक है वहीं अत्यधिक हो जाने पर अपने भयानक अवतार से जीवों के प्राण चुने लेता है।आज हम आपको प्रकृति के उसी भयानक स्वरूप से परिचित कराने का प्रयास करेंगे।देश और दुनिया में आने वाले कई हृदयविदारक तूफानों का जिक्र होते ही हमारे रोंगटे खड़े हो जाते हैं।आज कुछ ऐसे ही तूफानों से आपका परिचय कराते हैं।जिनसे यह बोध निरंतर होता है कि मानव,प्रकृति की ही देन है और उसे प्रकृति के स्रोतों के भोग की स्वतंत्रता है,उस पर आधिपत्य का अधिकार नहीं है।
इस रोचक तथ्य को आरंभ करते हैं मध्य एशिया के रेगिस्तानी इलाकों में आने वाले रेतीले तूफान से।हमारे देश भारत के भी थार रेगिस्तान में कई बार ऐसे तूफान देखे गए हैं।राजस्थान में इनके द्वारा कई लोगों को अपनी जान तक गवानी पड़ी थी।सैकड़ों फीट ऊंचे उड़ते रेत ऐसे लगते हैं मानो मौत का निमंत्रण ले कर आ रहे हो।80से90 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से बहने वाली हवा रेत को ऊपर की तरफ उड़ा लेती है और तेज़ी से हवा की दिशा में धकेलते आगे बढ़ती जाती है।ऐसी स्थिति में जान बचाना भी एक चुनौती हो जाती है।
क्या हो जब आकाश को छूती हुई ज्वालाएं नदियों का रूप ले बहने लगे।हम बात कर रहे हैं ज्वालामुखी की।पर्वतों से निकलती ज्वालाएं, मैग्मा के रूप में बहती जाएं और अपने रास्ते में आने वाली सभी चीज़ों को तबाही की शक्ल में बदलती आगे बढ़ती जाती है।इसकी तबाही को रोकना असंभव है क्यों कि बहते हुए आग के सामने भला क्या बचा रह सकता है।पर्वतों से फटने वाली ज्वालाओं से वहां की जमीनें फट जाती हैं,भूकंप आ जाते हैं और कई जहरीली गैस वातावरण में विष घोलने का काम करती है।दुनिया में ऐसे कई ज्वालामुखी हैं जो कभी भी फट सकते हैं।अमेरिका के हवाई महाद्वीप किलुआ ज्वालामुखी में सबसे बड़ा विस्फोट दर्ज किया गया है।इसका लावा 30 हज़ार मीटर की ऊंचाई तक उड़ा और सैकड़ों मीटर में फैला था।
अगली तबाही है बर्फ की बारिश।अमेरिका और कनाडा में ज्यादातर बड़े बड़े बर्फ के पत्थरों की बारिश देखने को मिलती है।जिसमें घरों से निकलने तक पर लोगों की जान जा सकती है।
रिमझिम बारिश की फुहार हम सभी को भाती है लेकिन कैसा दृश्य हो जब एक ही स्थान पर बड़े बड़े बदल फट जाए और हजारों टन पानी एक ही बार में बरस पड़े।इससे दो सेंटीमीटर तक पानी का स्तर बढ़ जाता है और बाढ़ आजाती है। बादल फटने की सबसे अधिक घटनाएं भारत में ही देखी गई हैं।केदारनाथ में बादल फटने की घटना तो हम सब को याद होंगी।अचानक फटने वाले बादलों को प्रेगनेंट बादल, क्लाउड बर्स्ट आदि नामों से भी जाना जाता है।
आखिरी हवा के प्रकोप की बात करें,तो दो सौ किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से बहने वाली हवा विनाश का कारण ही हो सकती है।इन्हे देखने से ही प्रलय का बोध हो जाता है।ये चक्रवात धरती से लेकर आकाश तक जुड़े होते हैं। इन तूफ़ानी चक्रवातों को देखकर कोई भी भय के अतिरिक्त कोई अनुभूति नहीं कर सकता। इन्हें टोरनैडो,साइक्लोन आदि नामों से भी जाना जाता है।
सच जितनी विचित्र है यह प्रकृति उससे भी अधिक अद्भुत है उसकी व्यवस्था।एक तरफ स्नेह की शीतलता है तो दूसरी तरफ प्रचंड तबाही का भय।

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