पहाड़ों की संस्कृति:संघर्ष का जीवन

पहाड़ों
71 / 100

पहाड़ों की संस्कृति :  संघर्ष का जीवन

  1. वैसे तो दुनिया में तमाम क्षेत्र हैं जहां मानव अपना जीवन तलाशता है। इन सब में सबसे श्रेष्ठ किसी माना गया है तो पर्वतीय जीवन शैली है, इसके पीछे कारण भी बेहद संजीदा है इस शैली में मनुष्य प्रकृति के अतिरिक्त और कोई विकल्प चुन सकता है। शायद यही कारण होगा कि यह जीवन प्रकृतिनुमां हमें लगने लगता है। जब हम आम जीवन शैली से ऊब जाते हैं तो पहाड़ों में पनाह ढूंढते हैं। उस समय हम यह नहीं सोचते कि क्या जनजातीय भीड़ को एकांत में रहने वाला पहाड़ स्वीकार करेगा।

पर्वतों के बारे में यह बात सर्वविदित है कि ध्यान की मुद्रा पर्वत है, यही कारण होगा कि भगवान शंकर ने इसे अपना निवास बनाया या फिर भगवान शिव के निरंतर समाधि में होने के कारण यह शांत है, इन दोनों बातों में बड़ा संशय है। शांत और वीरान रहने वाली ऊंची चोटियों के अलावा यह पर्वत ही चंचल नदियों को आधार बनता है। जीवन की धारा को प्रवाहित करने का मुख्य स्रोत बनते हैं पर्वत, हिंद देश के लिए कठोर और दृढ़ हिमालय रक्षा कवच की भूमिका में तत्परता से खड़ा होता है।

इस परिचय के बाद अब दृष्टि अगर भीतर पसरी हरियाली की तरफ जाएगी तो निश्चित रूप से नवजीवन को आकर्षित करेगी। हरी चादर ओढ़े पहाड़ और उन्हें छू कर जाती ठंडी हवा जीवन में शांति और संतोष भर देता है। शांति दुनिया की भीड़ से होने का और संतोष अभाव में भी पूर्ण होने का। तेज धार से बेहतर शीतल जल को देख और समृद्ध मन में उत्साह और सकारात्मक ऊर्जा भर जाती है, यही उर्जा तो एक पर्वत के स्मरणीय क्षेत्र में रहने वाले व्यक्ति को जीने का साहस देती है। कभी ठंडी, भोजन की कमी, अधिक वर्षा, भूस्खलन यह सभी परेशानियां पहाड़ी जीवन के लिए चुनौती होती हैं जिस पर एक मानव लगातार चढ़ाई चढ़ता है।

ऊंचे ऊंचे देवदार के वृक्ष जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा करते हैं। देवदार के जंगल में औषधि, अनाज, फल और सब्जियों के इतनी प्रजातियां हैं कि अध्ययन का विषय है। रामायण का वह प्रसंग जिसमें लक्ष्मण के घायल होने पर हिमालय के रमणीय क्षेत्र में ही संजीवनी बूटी नामक औषधि मिली, जिसकी सहायता से लक्ष्मण को जीवनदान मिला, यह सालों से शोध का विषय है। इस प्राकृतिक जीवन में वेशभूषा और खान-पान भी पहाड़ों पर आधारित होता है, इसके माध्यम से ही सौहार्दपूर्ण और खुशहाल जीवन शैली का निर्माण है, जो एक संस्कृति को जन्म देती है। यहाँ तीज, त्यौहार, भाषा, बोली थी जन-जंगल जीवन पर आधारित होती है।

 

Article By Shambhavi Shukla

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *