पत्रकार के रूप में पंडित दीनदयाल उपाध्याय

भारत
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पत्रकार के रूप में पंडित दीनदयाल उपाध्याय

पंडित दीनदयाल उपाध्याय एक बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी थे। जिसमें राजनीतिज्ञ, विचारक, लेखक, समाजसेवी और एक पत्रकार के गुण शामिल हैं। जी हां! एक ऐसा पत्रकार जिसकी दृष्टि तो दिखी, पढ़ी गई लेकिन अपने खुद के पत्र-पत्रिकाओं में भी उन्होंने अपना नाम छुपाए रखा। लेकिन अप्रत्यक्ष पत्रकार के रूप में हमेशा बनें रहे। जब आवश्यकता होती तो वास्तविक संचालक, संपादक और मशीन मैन के रूप में पंडित दीनदयाल हमेशा मौजूद रहते थे। पंडित उपाध्याय एक ऐसा नाम हैं जिन्होंने स्वतंत्रता प्राप्ति के पूर्व पत्रकारिता के माध्यम से स्वाधीनता के लिए प्रेरित करने का काम किया। वहीं स्वातंत्र्योत्तर पत्रकारिता में वह बड़ा नाम बन कर जाने ग‌ए।जब स्वतंत्र भारत में साम्यवादी और समाजवादी विचारधारा प्रभावी होने लगी,ऐसे में पंडित जी ने अपनी लेखनी के माध्यम से राष्ट्रवादी दीपक प्रज्ज्वलित करने का काम किया।
1947 में उन्होंने औपचारिक रूप से पत्रकारिता के क्षेत्र में पांव रखा। उन्होंने राष्ट्रधर्म के प्रकाशन से पत्रकारिता को एक मिशन के रूप में इस्तेमाल किया, जिसके लिए वह जानी जाती है। बड़ी बात तो यह है कि जब भारत स्वतंत्र हुआ और पत्रकारिता का रुख बदलता दिखा, वह पंडित जी ही थे, जिन्होंने तब भी पत्रकारिता को मुहिम के लिए प्रयोग किया और वह राष्ट्र जागरण का हिस्सा बनी रही। आज से करीब 80 वर्ष पूर्व ही वह जानते थे की पत्रकारिता जनसंवाद का सबसे बड़ा माध्यम हो सकती है। इसलिए राष्ट्रवादी विचारों के प्रसार हेतु उन्होंने पत्रकारिता को चुना। इस बात की पुष्टि 1948 मैं मकर संक्रांति के अवसर पर ‘पांचजन्य’ के प्रकाशन से होती है। हालांकि इसका संपादन अटल बिहारी वाजपेई की किया लेकिन प्रकाशित सामग्री का चयन और पत्र की दृष्टि उपाध्याय जी की ही थी। इस पत्रिका में वह ‘विचारवीथी’ के नाम से स्तंभ लिखते थे। हिंदी के साथ साथ अंग्रेजी पर भी उनकी अच्छी पकड़ थी। जो ‘ऑर्गेनाइजर’ के अंकों में देखा जा सकता है। पॉलिटिकल डायरी के नाम से इसमें प्रकाशित स्तंभ दीनदयाल जी की तत्कालिक विषयों पर उनकी दृष्टि को प्रसारित करते हैं।
दीनदयाल जी की पत्रकारिता पर डॉक्टर महेश चंद्र शर्मा ने अपनी किताब में लिखा कि संत फतेह सिंह के आमरण अनशन को लेकर पांचजन्य मैं एक शीर्षक लिखा कि ‘अकालतख्त के काल’। इसको दीनदयाल जी ने हटवाया और इस तरह के शब्दों को प्रयोग में लाने से मना भी किया। उनका कहना था कि यह सामाजिक समरसता को चुनौती देता है। इन सभी तथ्यों को देख कर यह कहा जा सकता है कि पत्रकारिता में इतना कम समय देने पर दीनदयाल जी ने उत्कृष्ट पत्रकार होने का परिचय दिया। अगर उन्हें थोड़ा और समय दिया गया होता तो भारतीय पत्रकारिता की दिशा और दशा कुछ और ही होती। इसमें भी उसी तरह के परिवर्तन सामने आए होते जैसा कि भारतीय राजनीति में देखे जा सकते हैं।

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