गुरुद्वारे का लंगर: समता का प्रतीक

गुरुद्वारे का लंगर
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गुरुद्वारे

गुरुद्वारे का लंगर: समता का प्रतीक

जिस तरह से तीर्थस्थल श्रद्धा और आस्था का स्थल माने जाते हैं वैसे ही ये सभी स्थान भूखे,गरीबों का पेट भी भरते हैं। इन धार्मिक स्थानों में गुरुद्वारे का नाम सबसे पहले आता है।जब भी हम गुरुद्वारे की पंगत में खाना खाते हैं,यह जरूर सोचते होंगे कि आखिर ये लंगर शुरू कैसे हुआ?क्या है इसके पीछे की ऐतिहासिक और रोचक कहानी?
ऐतिहासिक कहानियों के अनुसार,सिख के पहले गुरु नानक देव जी को उनके पिता ने व्यापार करने के लिए कुछ रुपए दिए।जिससे कि वह बाज़ार में सौदा कर काफी लाभ कमा सकते हैं।पिता की बात मान नानक बाज़ार की तरफ चल दिए।तभी उन्होंने कुछ भूखे भिखारियों को देखा।नानक का मन शुरू से ही लोगों की सेवा में लगा रहता था और व्यापार,लाभ में कोई खास रुचि नहीं थी।नानक ने उन रुपयों को भूखों को भोजन कराने में खर्च कर दिए और घर खाली हाथ लौट आए।घर लौटने पर पिता से मिली फटकार पर उन्होंने कहा कि सच्चा लाभ सेवा में ही है। तब से नानक भूखों और संतों को भोजन कराने के लिए चंदे और दान इकट्ठे करते और रोज भोजन कराते।सिख धर्म की शुरुआत करते समय भी नानक ने इस परंपरा को कायम रखा जिसे सिखों के सभी गुरुओं ने आगे बढ़ाया खास तौर पर तीसरे गुरु अमरदास जी ने।आज भी सिखों के आराधना स्थल गुरुद्वारे में सेवा भाव के लिए भोजन परोसने का चलन है जिसे लंगर कहते हैं।
आपको जान कर आश्चर्य होगा कि गुरुद्वारे में परोसे जाने वाले लंगर के कितने फायदे हैं।15 वीं शताब्दी में शुरु की पहल के अनेकोनेक सामाजिक लाभ हैं।अमरदास जी ने तो यहां तक कह डाला कि लंगर में बिना प्रसाद लिए कोई ईश्वर के दर्शन कर ही नहीं सकता।इसीलिए जब सम्राट अकबर उनसे मिलने पहुंचे तब उन्हें भी लंगर में जमीन पर बैठ भोजन करना पड़ा।
बीते दशकों में जब छुआ छूत, जाति भेद, ऊंच नीच का अंतर अपने चरम पर था,उस हालत में बड़ी संख्या में लोग एक साथ, ज़मीन पर बैठ एक ही तरह का प्रसाद ग्रहण करते हैं।इससे समाज में फैले अंधविश्वास और भ्रांतियों को चुनौती मिलती है।आज जब हम दुनिया और देश में गरीबी और भुखमरी से लोगों को जूझते देखते हैं वैसी दशा में लंगर की व्यवस्था एक सकारात्मक रूप है।वह लोग जो दो जून की रोटी की व्यवस्था करने में समर्थ नहीं है,उनका आसरा बनता है यह लंगर।हजारों ऐसे लोग हैं जो अपना पेट इन लंगरों से भरते हैं।लंगर की इस परंपरा से प्रेरणा लेकर अब मंदिरों में भी भंडारे और अन्नक्षेत्र की व्यवस्था शुरू हो चुकी है।जिससे देश विदेश से आए तीर्थयात्रियों को भोजन मिलता है। यही से पंजाब में साझे चूल्हे का भी चलन आता है।
वैसे तो जहां भी दुनिया में सिख बसते हैं, उन्होंने लंगर की परंपरा को कायम रखा है।इसे तैयार करने का तरीका बहुत सरल और पवित्र होता है।उत्सवों और त्यौहारों पर विशेष लंगर आयोजित किया जाता है।गुरुद्वारों में यह नियमित रूप से चलता है।मिट्टी के अस्थाई चूल्हों पर स्वयंसेवकों द्वारा आटा गूथना,सब्जी काटना,पकाना, दाल रोटी पकाना सब काम किए जाते हैं।अब तो इन कामों के लिए आधुनिक भट्टियों और मशीनों का भी इस्तेमाल होने लगा है।
अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में दुनिया का सबसे लंगर आयोजित होता है।जहां 24 घंटे लगभग 70 हज़ार लोगों के भोजन की व्यवस्था की जाती है।दो लाख से अधिक रोटियां और हज़ार क्विंटल दूध से खीर और कई सौ क्विंटल दाल सब्जी बनाई जाती है।जो कि किसी पहलवान के ढाबे से अधिक स्वादिष्ट होती है।यहां पर बड़े बड़े आदमी भी थाली धोने और रोटियां सेंकने में अपना सौभाग्य समझते हैं।यहां कोई कर्मचारी नहीं बल्कि स्वयंसेवक होते हैं और रसोई का खर्च भी दुनिया भर से आए दान द्वारा होता है।दिल्ली का बंगला साहेब और पटना का गुरुद्वारा की रसोईयां भी लंगर की परंपरा में अहम भूमिका निभाती हैं।दुनिया में समता की मिसाल है गुरुद्वारे का लंगर।

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