कोरोना काल में भी नहीं थमता अफवाहों का बाज़ार

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कोरोना  काल में भी नहीं थमता अफवाहों का बाज़ार

 

कोरोना : आधुनिक मीडिया जिन तकनीकी सुविधाओं के साथ लैश है उसने मीडिया अधिक प्रभावी,रोचक और व्यक्ति परक तो बनाया ही लेकिन इसके साथ एक और बात को बढ़ावा दिया वह थी फेक न्यूज की।अब वर्तमान विश्व की ही अगर चर्चा करें तो मीडिया में ब्रेकिंग न्यूज़ के रूप में कोरोना के बाद अगर कोई खबर रही तो यह कि कहां हैं किम जोंग उन?क्या वह जिंदा हैं या उनका ब्रेन डेड हो गया है?ऐसी तमाम बातें आप नित्य निरंतर समाचार में सुने होंगे।
वैसे तो उत्तर कोरिया के तानाशाह किम जोंग उन आए दिन अपने कारनामों के लिए चर्चा में बने रहते हैं।अभी भी उन्हें लेकर रहस्य बरकरार है।जबकि अब उनके जीवित होने का मुद्दा दो गुटों में बंटता दिखाई दे रहा है।एक जो उसका समर्थक है और दूसरा जो इसका विरोध करता नज़र आ रहा है।हांगकांग के एक वरिष्ठ पत्रकार ने दावा किया कि किम की मौत हो गई है इसके लिए उन्होंने पुख्ता सूत्रों का हवाला भी दिया। इसके बाद सीएनएन ने भी यह खबर दिखाई और फिर तो अफवाहों और दलीलों का तांता लग गया।हालांकि दक्षिण कोरिया ने इसका खंडन करते हुए हार्ट सर्जरी के बाद किम को स्वस्थ बताया।विगत 15अप्रैल को अपने दिवंगत दादा के जन्मदिन के कार्यक्रम में जब किम ने हिस्सा नहीं लिया इससे दुनिया का आकर्षण इस ओर बढ़ता गया।2012के बाद इस वर्ष ही किम ने शिरकत नहीं की।फिर अनुमान लगाया जाने लगा कि सनकी तानाशाह की तबीयत गंभीर रूप से खराब है।जिससे उसका ऑपरेशन किया गया।कुछ समाचार चैनलों ने तो किम को कोरोना का शिकार भी घोषित कर दिया।कुछ ने उन्हें कोमा में जाने की सूचनाएं दी।कुछ का यह भी कहना है कि किम केरिजॉर्ट बीच पर स्थित अपने लग्जरी रिजॉर्ट पर थे। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी इस बहस में कूद पड़े और किम के बीमार होने और मरने की खबर को गलत बताया। इसके अलावा जब किम जोंग की विशेष ट्रेन देखी जाने से इस खबर कि रोचकता और बढ़ गई ।ट्रेन देखें जाने से उनकी तबीयत की पुष्टि नहीं होती लेकिन इतना जरूर हो गया कि वह जीवित हैं और वोंसन में ही कहीं हैं।जब उत्तर कोरिया की मीडिया ने तमाम बातों का खंडन करते हुए अपने राजा को स्वस्थ बताया तब जाकर कहीं अपुष्ट खबरों का बाज़ार ठंडा पड़ता नज़र आया।
आधुनिक पत्रकारिता के पतन के दौर में आज अफवाहों को गति दे एजेंडा सेटिंग का चलन शीर्ष पर है।ऐसी दशा में इस प्रकार की सूचनाएं जिसमें तथ्यों का सर्वथा अभाव रहता है।फिर इसकी सत्यता और उसकी प्रमाणिकता पर प्रश्न करना फ़िज़ूल है।आज विश्व जहां कोरोना जैसी महामारी से अपनी लड़ाई लड़ने में परेशान और व्यस्त है,वहीं दुनिया को एक नई आभाषी दुनिया की तरफ धकेल देना कितना सही है?शायद!मेरे शब्द पत्रकारिता के आयामों को आघात अवश्य करते होंगे लेकिन यह वर्तमान विषय के लिए उतना ही सही है।

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