इच्छाएं क्या है? और मानव जीवन मे इसकी क्या महत्ता है ?

इच्छाएं
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इच्छाएं

इच्छाओ की पराकाष्ठा।

 

इच्छाएं

इच्छाएं ही दुर्गुणों की जननी है। इच्छाओ के वश में वशीभूत प्राणी सही गलत, न्याय, अन्याय का अंतर नही समझ पाता। उसे सिर्फ अपनी पड़ी रहती है, परिवार में, समाज मे, राष्ट्र में क्या हो रहा है? इससे उसे कोई फर्क नही पड़ता। हम ये नही कहते कि इच्छओं का दमन कर देना चाहिए। इच्छाओं का चयन करना आवश्यक है। आपकी वह इच्छा जिससे मानव समाज का कल्याण हो, आपको महा मानव बना सकता है। किंतु जो मन मे आये यथा दुर्गुण युक्त, किसी को तकलीफ देने की इच्छा, किसी से ईर्ष्या, किसी से द्वेष, किसी का उचित अनुचित सोचे बिना सिर्फ अपनी इच्छाओं को पूर्ण करना। ये न्याय संगत नही है। इसीलिए कहा जाता है कि यदि जीवन मे मनुष्य इच्छाओ का त्याग कर दे वह सबसे आनंद मयी जीव बन जाता है।

हालांकि इच्छाओ का चयन करना, की कौन सी इच्छा सर्व मानव कल्याण के लिए उचित है और कौन अनुचित है, इसके लिए आपको अपने आस पास का सामाजिक वातावरण मानवीय सभ्यता के अनुकूल बनाना होगा। संगत का असर पड़ता है। ऐसा क्यों कहा गया है कि संगत का असर पड़ता है। इसलिए कि आप जिस भाव मे अपने जीवन की शुरुआत करते है, आपको उसी भाव के अनुरूप सब कुछ दिखाई देने लगता है , और जो मनुष्य आपके भावो के प्रतिकूल आचरण करता है, आप उसे तनिक भी पसंद नही करते है।

मनुष्यता का पहला चरण यही है कि अपने विवेक का उपयोग करके पहले ये जान लेना चाहिए कि मानव कल्याण किस कार्य को करने में हितकर है। उसी अनुरूप आप अपने आस पास का वातावरण बनाइये, यथा अपने परिवार को, अपने मित्रों को, अपने कुटुम्बियों को, अपने समाज को।
अच्छाइयों की व्यख्या करना उचित नही समझता क्यों कि सभी जानते है कि अच्छाई किसमे है। सांस लेने के लिए दुर्गन्ध वाले स्थान पर जाना कोई पसंद नही करेगा। ये अंतर स्पष्ट है। पोषण के लिए कौन सा भोजन करना हितकर होगा, ये भी स्पष्ट है। अग्नि के पास जाना, उसे छूना हितकर है अथवा नही, ये सभी को पता है। ऐसे ही सगुन और दुर्गुण भाव के बारे में भी बड़ी सरलता से जाना जा सकता है।

सगुण भाव को अपने अंदर समाहित करने के बाद उसी अनुरूप अपनी इच्छाओं को बड़ा करना, और उसी अनुरूप कार्य करना बड़ा ही सहज हो जाता है। अतः मानव की परिकल्पनाओं में इच्छाओ के महत्व को देखते हुए इच्छाओ के चयन के लिए भी थोड़ा मन को शांत करना होगा।

किसी भी बड़े काम को करने के लिए, निर्णय लेने से पहले उसके यथार्थ के बारे में चिंतन करना आवश्यक है। जब तक हम ऐसे कार्य नही करेंगे, मानव जीवन मे जन्म लेने का कोई आधार नही रह जाता है। हम ये नही कहते कि इच्छाओ का दमन कर देना चाहिए। इच्छा को पूर्ण करना ही मानव का सबसे परम् धर्म भी है। हम सिर्फ ये कह रहे है कि इच्छाओ का चयन सही दिशा में होना चाहिए। चाटुकारिता, लोलुपता, मद, लोभ, ये भी इच्छाओ की श्रेणी में ही आती है। ऐसी इच्छाओ से हमे बचना चाहिए, बचना ही नही, वरन कोसो दूर रहना चाहिए। इसके लिए आपको अपने आस पास का माहौल उसी के अनुरूप बनाना होगा। धर्म अर्थ काम मोक्ष आदि इच्छाओ के फलीभूत अपना परिणाम देते है।

धर्म भी मानवीय आचरण के अनुकूल होना चाहिए, मास मदिरा भोग विलास आदि दुर्गुणों में लिप्त मनुष्य धर्म युक्त वेश भूषा बना लेने से धार्मिक नही हो जाता। ये तो स्वयं को और अपने समाज को धोखा देने के बराबर है। जो सबसे बड़ा अन्याय है। अर्थ अर्जित करना और उसका उपभोग करना भी मानवीय सभ्यता के अनुकूल होना चाहिए। येन केन प्रकारेण अर्थ अर्जित करना, अन्याय ही नही वरन घोर पाप भी है। किसी को दुख देकर, किसी के धन को छीनकर, किसी से कपट करके, किया गया धन कही से भी मानव समाज के लिए उचित नही है।

अधर्म आचरण का उपयोग करके कमाया गया धन कही से भी न्याय संगत नही है। चोरी कर लेना, किसी की हत्या करके धन हड़प लेना, ये धर्म युक्त है या अधर्म युक्त, सभी को पता है। इस प्रकार के दुर्गुण मार्ग का चयन करके धन अर्जित करने के बाद कितना भी खर्च करिये, कोई फायदा नही। ये सभी असीमित इच्छाओ के मार्ग में आने वाले मार्ग की वो कामना है जो मनुष्य को पतन की ओर ले जाती है।

अतः इच्छाओ को अपने मन के अंतःकरण में लाना और उस इच्छा का पूर्ण करना, और यह देखना की न्याय संगत है अथवा नही, हमे धैर्य पूर्वक निरीक्षण करके ही इच्छाओ को पूरा करने का प्रयास करना चाहिए।

यूरोप में पुनर्जागरण के पश्चात यूरोपीय देशों में अपने को महान सिद्ध करने के लिए वहाँ की शासन व्यवस्था और उस जगह के रहने वाले लोगो ने दौड़ प्रतियोगिता कर ली, की भागने में अनैतिक आचरण करके धन संग्रह करने में कौन जीतेगा। नतीजा यह हुआ कि पूरा विश्व अंधी दौड़ में शामिल हो गया।

भारत जैसे आध्यात्मिक देश मे भी उस प्रतियोगिता ने लोगो को जकड़ लिया। बहोत दिनो तक हमारे लोगो ने पीछे पीछे भागने शुरू किया। बाद में 20 वी सदी तक आते आते भारतीय शहरों में इस अंधी लोलुपता, स्वार्थ से भरी अंधी दौड़ वालीप्रतियोगिता ने भारत के लोगो को जकड़ना शुरू कर दिया। 20 सदी तक भारत के शहरों में ही यह अंधी प्रतियोगिता चलती रही। किन्तु 21 वी सदी में इसने भारत की आत्मा गाव में भी अपनी पकड़ मजबूत बनानी शुरू कर दी।
आज का मानव प्रातः काल उठता है, झोला उठाता है, और निकल लेता है उस अंधी दौड़ प्रतियोगिता में। और यदि उसे एक दो मुवक्किल बेवकूफ बनाने के लिए मिल गए, और यदि उसने उस आदमी से छल कपट एवम धूर्तता से धन अर्जित कर लिया तो शाम को घर आकर बड़ी शान से अपने घर वालो को बताता है कि आज हमने अपने बुद्धि का प्रयोग करके फला आदमी को बेवकूफ बनाकर धन इकट्ठा किया।

दिन भर हर मनुष्य दूसरे को बेवकूफ बनाने के लिए छल प्रपंच का सहारा लेता है और उसी कार्य को अपनी उपलब्धि मान कर घर आकर अपने परिवार तथा कुटुंबो को बहोत ही गर्व से व्याख्या करता है। क्या आपने सोचा है कि, धूर्तता पूर्ण कार्य करके कमाया गया धन कितना सही है? सुबह से लेकर शाम तक जितना दिमाग खर्च किया, जितना शारीरिक मेहनत की, क्या उसका प्रतिफल आपको मिल रहा है। भागदौड़ की जिंदगी है नही, मानव ने स्वयं बना ली। सच तो यह है कि जिसका जो काम है, वो अपना काम नही कर रहा है, बल्कि दुसरो में अपना भाग्य ढूढ़ रहा है।

काम वही है, बस देखने का नजरिया बदल गया है। इच्छाओ ने उन्हें इतना जकड़ लिया है कि लोगो का मन भ्रमित हो गया है। खूब धन कमाने के चक्कर मे स्वयं अपना अस्तित्व भूल चुका है।

मेरा तो मानना है कि प्रत्येक मानव को आज के जीवन मे परिश्रम करना चाहिए, किन्तु परिश्रम ऐसा की आत्म संतोष मिले। और आत्म संतोष तभी मिलेगा जब मनुष्य अपनी इच्छाओ को अपने अनुकूल बनाएगा।

रचनाकार।
शिवा कांत पांडेय

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