आरक्षण एक सोच की बैसाखी

आरक्षण
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आरक्षण एक ऐसी बीमारी जिससे लोग बीमार भी हैं और दवा भी नही लेते।

अगर आरक्षण को सिर्फ इस लिए लाया गया था कि पहले लोग गरीबी के कारण वो सुविधाएं नही पाते थे जो को जमीदारों और समान्य जाति के लोगो को मिलता था।
अब इन दिक्कतों को देखते हुए आरक्षण स्वाभाविक था लेकिन तब अगर थोड़ा सा इस बात पर भी गौर किया गया होता को उन गरीबों को आरक्षण के बजाए वो सुविधाएं दिल दी गयी होती जिससे वो आरक्षण के बैसाकी के बजाए एक मजबूत ज्ञानी की तरफ अपने हिस्से का हक़ उन ज़मीदारों और सामान्य जाति के लोगो से छीन लेता तो शायद ये जातिवाद आज इस 20वी सदी तक प्रभावी नही होता।

लेकिन कुछ राजनेता अपने निजी स्वार्थ के लिए आरक्षण को इस तरह से लोगो को बताया जैसे बिना आरक्षण उनका कुछ नही हो सकता हैं।
असल मे वो राजनेता उन सभी गरीबों को ये जताने की कोशिश कर रहे थे कि वो सभी गरीब अपने दिमाग या हुनर के चलते कुछ नही कर सकते बल्कि उनको आरक्षण की लाठी चाहिए ये उन गरीबों की घोर बेज्जती थी ।
आज अगर हम उन जाति की तरफ देखे तो हम पाएंगे कि उन्ही गरीबों में कुछ ऐसे भी लोग हैं जो कि ये सिद्ध करते रहते हैं कि इंसान जाति या पैसों के दमपर एक ज्ञानी नही बनता बल्कि वो अपने मेहनत और कर्म से एक ज्ञानी इंसान बनता हैं।

आज भी आरक्षण की सोच सिर्फ वो लोग रखते हैं जिनको पता हैं उनको एक बैसाखी चाहिए जिसके सहारे चला जा सके जबकि उन्ही जाति या समुदाय में बहुत से लोग आरक्षण के बैसाखी को एक अभिशाप की तरह देखते हैं और ये सिद्ध करते रहते हैं कि ज्ञान किसी जाति या समुदाय की जागीर नही हैं ये एक ऐसा प्रकाश है जो कि कोई भी इंसान जल सकता हैं।

आप लोग अपना मत इस बात पर जरूर दीजिये कमेंट में की आरक्षण सही हैं उन उन समस्याओं का समाधान जिनकी वजह से आरक्षण की जरूरत पड़ती हैं।
अगर उन जरूरतों को हर उस इंसान तक पहुँचाया जाए जो आरक्षण की तरफ देख रहे हैं और वो बिना आरक्षण खुद को साबित कर ले कि सुविधाओं के अभाव के कारण उनको बैसाकी चाहिए थी नही तो हुनर उनमे भी इतना था कि वह लोग भी इससे लड़ सकते थे।

 

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