आधुनिक शिक्षा के बीच संस्कार खोते बच्चे।

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शिक्षा

शिक्षा और संस्कार

शिक्षा vs संस्कार : आज की आधुनिक शिक्षा को ग्रहण करने के बाद हमारे मानव जीवन मे कौन सा परिवर्तन आता है ? इसका विश्लेषण करने का समय आ गया है।
बन्धुओ जैसा कि हम सभी जानते है कि किसी भी राष्ट्र के निर्माण में उस राष्ट्र के नौनिहालों, युवाओ का बहोत ही योगदान रहता है। बच्चे ही आने वाले समय का द्योतक होते है। हमारे देश मे प्राचीन समय मे भारतीय संस्कृति, सभ्यता, एवम देश, काल, परिस्थिति के अनुसार शिक्षा प्रदान की जाती थी। जिसमे बच्चो को ज्ञान वर्धक शिक्षा के साथ साथ, मानव जीवन के प्रबंधन की शिक्षा दी जाती थी।

युवा पीढ़ी को सामाजिक, बौद्धिक, राजनीतिक रूप से कुशल प्रशिक्षित किया जाता था। किंतु बाद के समय मे हमारे राष्ट्रीय समाज मे परिवर्तन आना शुरू हुआ। हम चकाचौध की दुनिया को यथार्थ समझ बैठे। अन्य मतावलंबियों ने तो नही , किन्तु हमारे समाज के युवाओ ने हमारे अपने ही सामाजिक सांस्कृतिक ज्ञान को कूड़े का ढेर समझकर अपने जीवन से दूर कर दिया।

आज जो शिक्षा प्रदान की जाती है, उसका कोई भी अर्थ नही है। शैक्षिक आकलन करने के पश्चात ये दिखाई देता है कि जो शिक्षा युवाओ को दी जा रही है उसका हमारे जीवन मे किसी जगह कोई योगदान नही है, फिर भी हम इस बेढंगी शिक्षा को प्राप्त करने के लिए मारामारी कर रहे है।

बाल्यावस्था की शिक्षा कैसी होनी चाहिए ?

बाल्य अवस्था मे बालको का मष्तिष्क एवम जिज्ञासु छमता सबसे अधिक होती है। 5 वर्ष का बालक अधिक जिज्ञासु होता है। उसकी बुद्धि उस समय बहोत तीक्ष्ण होती है। उस समय बालक को राष्ट्र की संस्कृति एवम आचरण युक्त शिक्षा पर अधिक बल देना चाहिए, किन्तु आजकल देखा जा रहा है कि अभिभावक उसी उम्र में अपने बच्चो से इतने उम्मीदे पाल लेते है की उनके बस में हो तो माता पिता 5 वर्ष के बालक को सिविल परीक्षा में बिठा दे।

ध्यान देने वाली बात है कि आज के माता पिता आधुनिकता के अंधी दौड़ में खुद को इतना अंधा बना लिए है कि वो अपने बच्चो से कहते है, बेटा सुबह उठकर गुड मॉर्निंग बोला करो सबसे। किस संस्कृति का हिस्सा है ये ? हम अपने बच्चो को ये क्यो नही सिखाते की बेटा प्रातः काल उठकर सुप्रभात बोला करो, और अपने से बड़ो को प्रणाम किया करो।

अच्छा, आप सभी बताइये, इन दोनों संस्कारो रीति रिवाजों में आपको कौन सा रिवाज सबसे अच्छा लग रहा है। गुड मॉर्निंग बुलवाना या प्रणाम करके सुप्रभात बोलना।

एक बात तो तय है कि कोई भी व्यक्ति चाहे जितना ज्ञान अर्जित कर ले, चाहे जिस रूप, का ज्ञान अर्जित करे, लेकिन जब तक चारित्रिक विकास नही होगा, जब तक आचरण युक्त ज्ञान नही प्राप्त करेगा तब तक उस मनुष्य का, उस राष्ट्र का विकास नही हो सकता। इसलिए प्राथमिक दृष्टि में हम सभी को बालको के चारित्रिक विकास के लिए मानवता वादी, सुसंस्कृति युक्त शिक्षा पर बल देना होगा।

किशोरावस्था की शिक्षा कैसी होनी चाहिए।

बालक का अभ्युदय उसके शैक्षिक, बौद्धिक, शारीरिक, मानसिक विकास के साथ शुरू होता है। बालक जब बाल्यकाल में संस्कारों को अपने दैनिक जीवन मे उतार लेगा तो उसके लिए आगे चलकर जीवन के मार्ग में कठिनाइयां कम आएगी।

किशोरावस्था में बालक के देह में असीम ऊर्जा का संचार होता है। जिसे वो अपनी बुद्धि विवेक के साथ उपयोग करता है। मनुष्य का किशोरावस्था वैसा ही होता है जैसे प्रेशर कुकर में चावल पकाना। कितना भी आप दबाए रखो लेकिन उबाल से एक दो दाने बाहर आ ही जायेंगे। इसलिए यदि बच्चो को अच्छे बुरे का संस्कार बचपन मे डाल दिया जाता है तो किशोरावस्था में वह बालक अपने बुद्धि के साथ साथ अपनी शारीरिक ऊर्जा का भी यथोचित उपयोग कर सकता है।

मानव समाज चाहे जितनी प्रगति कर ले, किन्तु उसकी हर विकास की रूपरेखा उसके अतीत से जुड़ी होती है, किन्तु दुर्भाग्य की आज बच्चो को जो शिक्षा दी जा रही है, इस शिक्षा में बच्चो को महापुरुषों के बारे में बताया ही नही जाता। आखिर हम अपने पूर्वजो की बातों को क्यो आत्मसात करते थे ?

इसका सबसे बड़ा प्रमाण यही है कि हम पुरानी बातों से ही सीख कर आगे अपने जीवन को बढ़ाते है। किन्तु हमारे शैक्षिक पाठ्यक्रमो में उन महान पुरुषों के जीवन शैली उनकी मानव जीवन के जीने की कला के बारे में आज के बच्चो के साथ न साझा करना कही न कही बच्चो को उनके जीवन के साथ छलावा किया जा रहा है।

युवावस्था की शिक्षा।

जब वही बालक युवावस्था की दहलीज पर आ जाता है, तो वह बचपन के संस्कारों, एवम किशोरावस्था में प्राप्त ज्ञान के आधार पर अपने जीवन के लक्ष्य को प्राप्त करने का प्रयास करता है।

क्या आप सभी बुद्धिजीवियो को लगता है कि आज जो शिक्षा हमे विद्यालयों या अन्य शैक्षिक संस्थानों में प्रदान की जा रही है, वो उत्तम है या सिर्फ मानव के जीवन के साथ खिलवाड़ करने का साधन है। चिंतन करने की आवश्यकता है, कहाँजा रहे है हम? किस उद्देश्य को पूरा करने का संकल्प बना रहे है ?

शिक्षा मनुष्य के जीवन का आधार है। जब नींव ही खोखली रहेगी, तो मानव उद्देश्य कैसे पूर्ण होगा ? प्राचीन समय मे शिक्षा का उद्देश्य मानव प्रबंधन पर था, चिंतन पर था, नए नए प्रयोग एवम उसके आधार पर मानव के स्वचिन्तन का आधार था। किंतु आज की शिक्षा ने हम सभी की जिज्ञासा को ही शांत कर दिया।

सोचने की छमता का ह्रास हुआ। लेखकों का, साहित्यकारों का, कवियों का, वैज्ञानिकों का, लेखाकारो का, डॉक्टर्स का, हर क्षेत्र को कुछ मुट्ठी बंद लोगो ने अपने वश में कर लिया। हमारे सोचने समझने की विद्वता का हनन हुआ।

यदि वास्तव में मनुष्य चाहता है कि वो मानव जीवन मे रहकर अपने परिवार, अपने समाज तथा अपने राष्ट्र का विकास करे। तो इसके लिए शिक्षा प्रणाली को बदलना होगा। हमे उन महापुरुषों के बारे में बताना होगा जिन्होंने अपने बुद्धि के प्रयोग से समाज को जागृत किया। हमे उन लोगो के बारे में आने पाठ्यक्रम में रखना होगा। जिसको पढ़कर हमारा आज का नौनिहाल अपने समाज की तथा अपने देश की तरक्की कर सके।

हर देश का अपना वातावरण है, हर देश की अपनी संस्कृति है, हमारे देश मे भी स्वयं की संस्कृति होनी चाहिए। तभी हम और हमारा देश विकास की राह पर चल पाएगा।

हम फ़ास्ट फूड का सेवन करने लगे। जबकि हम जिस वातावरण में रह रहे है, फ़ास्ट फ़ूड के अनुकूल नही है। हम नए नए परिधानों का उपयोग करते है, जो हमारे देश के वातावरण के अनुकूल नही है। हमारी विदेशी भाषा हमारे संस्कृति की अनुकूल नही है, फिर भी हम दूसरी भाषा का इस्तेमाल करने पर अपने को गर्व महसूस करते है।

इसलिए यदि भारत के सर्वांगीण विकास करना है तो शुरुआत शिक्षा के स्तर को सुधारने से करना होगा। तभी हम और हमारा देश विकास कर पथ पर चल पाएगा। इसके लिए हम सभी को पहल करनी होगी।

चिंतक।
पं0 शिवा कांत पांडेय
आदर्श शिक्षा सेवा समिति

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