आत्मनिर्भर भारत एवं सशक्त महिलाएं, दीनदयाल के संदर्भ में

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आत्मनिर्भर भारत एवं सशक्त महिलाएं, दीनदयाल के संदर्भ में

भारत : बीते कुछ महीनों में एक शब्द हम सभी भारतीयों के दिलों दिमाग में बस सा गया है। वह शब्द है आत्म निर्भर। 2019 से 20 का कोरोना काल भारत को एक आत्मनिर्भर और सशक्त राष्ट्र बनाने के तरफ लगातार अग्रसर कर रहा है। इस आपदा काल में भारत ने इस बात को आत्मसात कर लिया है कि उसे आत्मनिर्भर और सशक्त बनना है। किसी भी राष्ट्र का विकास वहां रहने वाली महिलाओं के विकास से ही संभव हो सकता है। भारत में बीते 75 सालों में महिलाओं के उत्थान और सशक्तिकरण को लेकर तमाम सारे प्रयास किए गए हैं। जिसका परिणाम यह हुआ है कि आज महिलाओं की स्थिति में कुछ सुधार देखने को मिल रहा है। फिर चाहे वह विज्ञान हो या कला, वाणिज्य हो या सेना, हर तरफ महिलाओं ने अपना लोहा मनवाया है। इसका एक महत्वपूर्ण कारण है हमारे समाज सुधारकों के दार्शनिक विचार।जिसमें पंडित दीनदयाल उपाध्याय के विचार अत्यधिक प्रासंगिक हैं।
पंडित जी एक राजनीतिज्ञ, लेखक, पत्रकार, अध्ययनरत व्यक्ति के साथ-साथ समाज सुधारक भी थे। जिन्होंने महिला उत्थान को प्रोत्साहन दिया। पंडित जी पर आधारित पुस्तक राष्ट्र जीवन की दिशा:दीनदयाल उपाध्याय मैं बताया गया है कि वह महिलाओं के सम्मान को ही सच्ची देशभक्ति मानते हैं। वह कहते हैं कि हमारी राष्ट्रीयता का आधार भारत माता हैं। भारत माता में से माता शब्द हटा दीजिए तोभारत केवल जमीन का एक टुकड़ा मात्र रह जाएगा। इस भूमि का और हमारा ममत्व तब आता है जब माता वाला संबंध उडता है। कोई भी भूमि तब तक देश नहीं कहला सकती जब तक कि उसमें किसी जाति का मातृक ममता ना हो। उनके कहने का तात्पर्य है कि किसी भी जीव जंतु को उसके निवास से प्रेम होता है।केवल इस लगाव से देशभक्ति जागृत नहीं हो सकती।देशभक्ति तभी जागृत होगी जब मनुष्य को उसकी मिट्टी से मां जैसा प्रेम होगा तभी सच्ची देशभक्ति जगेगी।
दीनदयाल जी का महिलाओं के प्रति दर्शन इस विचार से स्पष्ट हो जाते हैं।वह भारत की कल्पना महिला के ही रूप में करते हैं।उनका मानना है कि महिलाओं का सम्मान और उनसे प्रेम ही सही मायने में देश की वंदना है।दीनदयाल जी ने महिला सशक्तिकरण को अध्यात्मिक दृष्टि से जोड़कर हमारे बीच रखा है,ठीक वैसे ही जैसे मां आदिशक्ति को भगवान विश्वनाथ की अर्धांगिनी कहा गया है।जिसने स्त्री पुरुष को समान बताया है।भारत की सनातन संस्कृति में भी महिला सशक्तिकरण की नींव देखने को मिलती है।इस धारणा को पंडित जी ने आधुनिक भारत के विकास और राष्ट्र के लिए निर्माण के लिए आवश्यक बिंदु मानते हैं।

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